Wednesday, 20 September 2017

मत खेलो अब प्रकृति से मानव तुम


नीला   आसमान   मैला   हुआ   है
प्रदूषण   चहुं  ओर  फैला  हुआ  है
मत खेलो अब प्रकृति से मानव तुम
जल भी अब  यहां  कसैला हुआ है

रेखा जोशी

Sunday, 17 September 2017

जादुई कलम

जादुई कलम ने
मेरी
कर दिया कमाल
लिखते ही
पूरे होने लगे
मेरे ख्वाब
रंगीन तितलियों सी
उड़ती रंग बिरंगी
अनेक ख्वाहिशें
मंडरा कर
सिमटती गई
कलम में मेरी
और
धीरे धीरे
महकाने लगी मेरा आंगन
पुष्पित उपवन
नभ पर विचरते पंछी
गाने लगे नवगीत
संग संग
और
खिल उठी मै भी
लिए हाथ में 
अपनी जादुई कलम

रेखा जोशी

प्रीत के घेरे में बन्ध गए हम और तुम


इंद्रधनुष के रंग
चुरा कर
कल्पनाओं की
कलम से
लिख दी
हसरतें अपनी
उड़ने लगी
आसमान में
फूलों सी लगी
महकने
परिंदों सी लगी
चहकने
आस की डोरी से
छलकने
लगी खुशबू
खुशियां अब
होने लगी
रू ब रू
प्रीत के घेरे में
बन्ध गए
हम और तुम
खो गए
रंगीन जहां में
हम और तुम

रेखा जोशी

Thursday, 14 September 2017

मुक्तक


बीती रात कब  यह  खबर न हुई
तुम  न आये तो क्या सहर  न हुई
मिला न  साथ  तेरा  ज़िन्दगी   में
आओ तुम पास  वो पहर  न  हुई

रेखा जोशी

                                  

Wednesday, 13 September 2017

ख्वाबों में तेरे सो गई आंखें


ख्वाबों में तेरे सो गई आँखे
तुझको सोचा तो खो गई आँखे
,
पाया जो तुमको जहान पा लिया
सपनो  में देखो खो गई आँखे
,
समाया  तेरी  निगाहों में प्यार
प्यार में पिया लो खो गई आँखे
,
सताती हमे अब  यादें तुम्हारी
यादों में अब तो खो गई आँखे
,
बिठाया तुमको पलकों पे  हमने
चाहत में अब जो खो गई आँखे

रेखा जोशी

Tuesday, 12 September 2017

गीतिका

मापनी - 122  122  122  122
समांत - अलो,  पदान्त - तुम

खुशी ज़िन्दगी में मिले गर चलो  तुम
मिले ज़िन्दगी में सभी कुछ फलो तुम
,
हमें तो मिली मंज़िलें ज़िन्दगी में
नही ज़िन्दगी अब कभी फिर छलो तुम
,
रहो आसमाँ में हमेशा चमकते
कभी शाम बन कर न साजन दलो तुम
,
हमेशा  करो  रोशनी ज़िन्दगी में
सदा दीप बन  ज़िन्दगी में  जलो तुम
,
कभी ,जिंदगी में न  छाये अँधेरे
न अपने कभी हाथ साजन मलो तुम

रेखा जोशी

रूप मां का धर आये भगवान धरा पर

मां की आंखों में छिपा असीम प्यार पढ़ो
ममता  स्नेह   अनुराग  का  भंडार   पढ़ो
रूप मां  का  धर  आये भगवान धरा पर
समाया  हृदय   में   सारा    संसार   पढ़ो

रेखा जोशी

Monday, 11 September 2017

कितने ईमानदार है हम?

कितने ईमानदार है हम ?इस प्रश्न से मै दुविधा में पड़ गई ,वह इसलिए क्योकि अब ईमानदार शब्द पूर्ण तत्त्व न हो कर तुलनात्मक हो चुका है कुछ दिन पहले मेरी एक सहेली वंदना के पति का बैग आफिस से घर आते समय कहीं खो गया ,उसमे कुछ जरूरी कागज़ात ,लाइसेंस और करीब दो हजार रूपये थे ,बेचारे अपने जरूरी कागज़ात के लिए बहुत परेशान थे |दो दिन बाद उनके  घर के बाहर बाग़ में उन्हें अपना बैग दिखाई पड़ा ,उन्होंने उसे जल्दी से उठाया और खोल कर देखा तो केवल रूपये गायब थे बाकी सब कुछ यथावत उस  बैग में वैसा ही था ,उनकी नजर में चोर तुलनात्मक रूप से ईमानदार था ,रूपये गए तो गए कम से कम बाकी सब कुछ तो उन्हें मिल ही गया ,नही तो उन्हें उन कागज़ात की वजह से काफी परेशानी उठानी पड़ती|

आज भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नही है जिसके दम पर सच्चाई टिकी हुई है | वंदना अपनी नन्ही सी बेटी रीमा की ऊँगली थामे जब बाज़ार जा रही थी तभी उसे रास्ते में चलते चलते एक रूपये का सिक्का जमीन पर पड़ा हुआ मिल गया,उसकी बेटी रीमा ने  झट से उसे उठा कर ख़ुशी से उछलते हुए  वंदना से कहा ,''अहा,मम्मी मै तो इस रूपये से टाफी लूंगी,आज तो मज़ा ही आ गया ''| अपनी बेटी के हाथ में सिक्का देख वंदना उसे समझाते हुए बोली  ,''लेकिन बेटा यह सिक्का तो तुम्हारा नही है,किसी का इस रास्ते पर चलते हुए गिर गया होगा  ,ऐसा करते है हम  मंदिर चलते है और इसे भगवान जी के चरणों में चढ़ा देते है ,यही ठीक रहे गा ,है न मेरी प्यारी बिटिया ।

'वंदना ने अपनी बेटी को  ईमानदारी का पाठ तो पढ़ा इस देश में ईमानदारी और नैतिकता जैसे शब्द खोखले,  निरर्थक और अर्थहीन हो चुके है,एक तरफ तो हम अपने बच्चों से  ईमानदारी ,सदाचार और नैतिक मूल्यों की बाते करते है और दूसरी तरफ जब उन्हें समाज में पनप रही अनैतिकता और भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है तब  हमारे बच्चे ,इस देश के भविष्य निर्माता टूट कर बिखर जाते है ,अपने परिवार  से मिले आदर्श संस्कार उन्हें अपनी ही जिंदगी में आगे बढ़ कर समाज एवं राष्ट्र हित के लिए कार्य करने में मुश्किलें पैदा कर देते है  और कुछ लोग सारी जिंदगी घुट घुट कर जीते है | 

हमारे देश में हजारों , लाखों युवक और युवतिया बेईमानी ,अनैतिकता ,घूसखोरी के चलते क्रुद्ध ,दुखी और अवसादग्रस्त हो रहे है ,लेकिन क्या नैतिकता के रास्ते पर चल ईमानदारी से जीवन यापन करना पाप है ?

  रेखा जोशी

Sunday, 10 September 2017

आज तेरी याद हमें फिर आईं है

आज तेरी याद हमें फिर आईं है
सपनों में महफ़िल हमने सजाई है
,
दिल ओ जान से हमने चाहा उनको
मिली हमें तो उनसे रुसवाई है
,
हमने सदा साथ तेरा है निभाया
न करना कभी हमसे बेवफ़ाई है
,
तड़पना है हमें तो प्यार में तेरे
मिली प्यार में हमको तो तन्हाई है
,
आदत है तेरी हमें तड़पाने की
दे दी हमको उम्र भर की जुदाई है

रेखा जोशी

Thursday, 7 September 2017

यमुना के तट पर मनमोहन गोपाला

यमुना के तट पर मनमोहन गोपाला
गोकुल में कान्हा संग गेंद खेलत ग्वाला

खेलत गेंद मोहन नटखट नंदलाला
थी आगे चली गेंद पीछे भागत ग्वाला
..
छवि नाग की देख गेंद फेंक यमुना में
फिर यमुना के पानी में कूदत गोपाला
..
जा पहुँचे पाताल मनमोहन कन्हैया
था जहाँ पे भयंकर नाग सोवत कालिया
..
था हुआ घमासान तभी जल के भीतर
नाग कालिया ने ज़हरीली भरत फुंकार
..
काला हुआ जल कान्हा श्याम कहलाये
मर्दन कर कालिया का गेंद आवत लाये
..
बँसी की मधुर धुन पर फिर हुआ चमत्कार
कृष्ण प्रेम की जयकार से गूँजत संसार

रेखा जोशी

खुशी हो या गम जियेंगे मरेंगे हम सदा साथ साथ

संग  संग  रहेंगे  सदा अब  यह  कहानी हमारी है
तोता-मैना   बहुत   सुने अब   तेरी -मेरी  बारी है
,
खुशी हो या गम जियेंगे मरेंगे हम सदा साथ साथ
हमारे कदमों तले अब साजन यह दुनिया सारी है
,
राहें कभी भी न जुदा हो हमारी जीवन में प्रियतम
सूरज की तपिश मिले या घटा घिरे कारी कारी है
,
साथ साथ अब हम दोनों चले मिलाकर  कदम से कदम
बहका बहका मौसम  कुहुके कोयलिया हर डारी है
,
गुंजित भंवरे तितली मुस्कुराती फूल खिले उपवन
साथ हमें पिया का मिला महकने लगी फुलवारी है

रेखा जोशी

दोहे

दोहे

नभ पर बादल गरजते ,घटा घिरी घनघोर ।
रास रचाये दामिनीे  ,मचा  रही  है शोर ॥
,
आँचल लहराती  हवा ,ठंडी पड़े फुहार ।
उड़ती जाये चुनरिया ,बरखा की बौछार ||
,
सावन बरसा झूम के ,भीगा तन मन आज ।
पेड़ों पर झूले पड़े ,बजे मधुर है साज़ ॥
,              
भीगा सा मौसम यहाँ  ,भीगी सी है रात ।
भीगे से अरमान है ,आई है बरसात ॥
      
कुहुक रही कोयल यहां ,अँबुआ की हर डार।
हरियाली छाई रही,है चहुँ ओर बहार।।

रेखा जोशी

कर लो सबसे तुम अब प्यार


कर लो सबसे तुम अब प्यार
जीवन अपना लो संवार
,
सेवा कर ले बन कर दास
होगा प्रभु का फिर दीदार
,
मिलता उनको है भगवान
तोड़ें नफरत की दीवार
,
हम को रहती तेरी आस
कर दो मेरी नैया पार
,
छोड़ो मत तुम प्रभु का हाथ
करते पूजा बारम्बार

रेखा जोशी

Wednesday, 6 September 2017

जाम ए ज़िन्दगी तो पीना है यारों


जाम ए ज़िन्दगी तो पीना है यारों
हमने  सदियों  कहां जीना है यारों
,
इबादत करें खुदा की मिली ज़िन्दगी
मानो  यह रब का  मदीना है यारों
,
साज बजाओ ज़िन्दगी में प्यार भरा
ज़िन्दगी मधुर  स्वर वीणा है यारों
,
भर लो दामन में अपने खुशियां यहां
ज़िन्दगी अनमोल नगीना है यारों
,
न जाने कब छोड़ दें यह संसार हम
पर्दा  मौत  का  तो झीना है यारों

रेखा जोशी

Tuesday, 5 September 2017

मुक्तक


देख  उन्हें  नयन  हमारे  खिल  जाते है
जीवन  के  हसीं पल हमें  मिल जाते है
संग संग चले मिला कर कदम से कदम
मचलते अरमान जब मिल दिल जाते है

रेखा  जोशी

Friday, 1 September 2017

प्रभु को तू कर के याद


प्रभु को तू करके याद
कर ले ज़िन्दगीआबाद
बाबाओं  के चक्कर में
मत कर ज़िन्दगी बर्बाद

रेखा जोशी

वक़्त से सीख ज़िन्दगी ले अब

“मज़मून – 173”
“शब्द" ***सीख /उपदेश /नसीहत एवं समानार्थी शब्द

वक़्त हमको कभी उठाता है 
यह उठा कर कभी गिराता है 
.... 
राह चलते मिले यहाँ सुख दुख 
ज़िंदगी   पार  रब   लगाता है 
.... 
देख कर मुश्किलें न डरना तुम 
वक़्त ही  खेल  आज़माता है 
.... 
वक़्त से सीख ज़िन्दगी ले अब
हार कर जीतना  सिखाता है
.....
आज हम खुशनसीब है साजन 
कल हमें क्या समाँ दिखाता है 
.....

रेखा जोशी 

Thursday, 31 August 2017

मुक्तक


किसने वादा किया है आने का
बहाना है हृदय को  जलाने का
इंतज़ार की भी अब हद हो गई
हो गया वक़्त यहां से जाने का

रेखा जोशी

वह साथ सबका निभाता है

क्यों आंख से जल छलकता है
सबका  सुख  दुख से  नाता  है
,
है  इसी का  नाम   तो  जीवन
कौन  खुशियां  सदा  पाता  है
,
हाथों  की  लकीरों  में  लिखा
अपनी  किस्मत  का खाता है
,
हंसना रोना  वक़्त  के  हाथ
वक़्त  खेल  यहां  दिखाता है
,
ले  लो सहारा प्रभु नाम का
वह साथ सबका  निभाता है

रेखा जोशी

Wednesday, 30 August 2017

हाइकु

हाइकु

विघ्न  हरता
हे सिद्धि विनायक
जय गणेशा
,
हे गजानन
दो हमें रिद्धि सिद्धि
अभिनंदन
,
गौरी नंदन
हे गणपति देवा
करें नमन
,
प्रथम पूज्य
मोदक मनभाते
हे एकदंत

रेखा जोशी

Tuesday, 29 August 2017

चारो ओर है जलथल जलथल

कैसी  यह  ज़िन्दगी  हे भगवन
आज  मौत में   है घिरे  भगवन
चारो ओर  है जलथल जलथल
पेट  की आग ना  बुझे  भगवन

रेखा जोशिल

मुक्तक


जब चाँद छुपा है बादल मेँ, तब रात यहॉं खिल जाती है
घूँघट ओढ़ा है अम्बर मेँ, चाँदनी यहाँ शर्माती है
तारों की छाया मेँ मिल के ,आ दूर कहीं अब चल दें हम
हाथों में हाथ लिये साजन,ज़िन्दगी बहुत अब भाती है

रेखा जोशी

मुक्तक


खिले फूल  उपवन में बहार के लिये
मिला सजना सजनी से प्यार के लिये
संग   चलते   मुस्कुराते  नज़ारे   भी
है ज़िन्दगी बस अब दिलदार के लिये

रेखा जोशी

Monday, 28 August 2017

पति परमेश्वर


पति परमेश्वर  (लघु कथा)

''सोनू आज तुमने फिर आने में देर कर दी ,देखो सारे बर्तन जूठे पड़ें है ,सारा घर फैला पड़ा है ,कितना काम है ।''मीना ने सोनू के घर के अंदर दाखिल होते ही बोलना शुरू कर दिया ,लेकिन सोनू चुपचाप आँखे झुकाए किचेन में जा कर बर्तन मांजने लगी ,तभी मीना ने उसके मुख की ओर ध्यान से देखा ,उसका पूरा मुहं सूज रहा था ,उसकी बाहों और गर्दन पर भी लाल नीले निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे । ''आज फिर अपने आदमी से पिट कर आई है ''?उन निशानों को देखते हुए मीना ने पूछा ,परन्तु सोनू ने कोई उत्तर नही दिया ,नजरें झुकाए अपना काम करती रही बस उसकी आँखों से दो मोटे मोटे आंसू टपक पड़े । मीना ने इस पर उसे लम्बा चौड़ा भाषण और सुना दिया कि उन जैसी औरतों को अपने अधिकार के लिए लड़ना नही आता ,आये दिन पिटती रहती है ,घरेलू हिंसा के तहत उसके घरवाले को जेल हो सकती है और न जानेक्या क्या बुदबुदाती रही मीनू । उसी रात देव मीनू के पति रात देर से घर पहुंचे ,किसी पार्टी से आये थे वह ,एक दो पैग भी चढ़ा रखे थे ,मीनू ने दरवाज़ा खोलते ही बस इतना पूछ लिया ,''आज देर से कैसे आये ,?''बस देव का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया ,आव देखा न ताव कस कर दो थप्पड़ मीना के गाल पर जड़ दिए । सुबह सोनू  अपनी मालकिन के सूजे हुए चेहरे को देख कर  अवाक रह गई ।

रेखा जोशी

Thursday, 24 August 2017

क्रोध को दुश्मन मत बनाओ

क्रोध को दुश्मन मत बनाओ
अपने को न तुम खुद सताओ
,
क्रोध जलाता खुद को पहले
दुश्मन इसे न कभी बनाओ
,
देगा रोग यह क्रोध इक दिन
इससे  शीघ्र  पीछा  छुड़ाओ
,
पागल सा यह  तुम्हे बनाये
इससे पहले  सम्भल जाओ
,
जला कर राख न करे  इससे
पहले  तुम  सागर बन जाओ

रेखा जोशी
,

Monday, 21 August 2017

जूही बेला मोंगरा की कली

जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
संवारती घर पिया का
गाती गुनगुनाती
.
पीर न उसकी
जाने कोई
दर्द सबका अपनाती
खुद भूखी रह कर भी
माँ का फ़र्ज़ निभाती
जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
.
कोई उसको समझे न पर
रोती लुटती बीच बाजार
रौंदी मसली जाती
गंदी नाली में दी जाती फेंक
चाहेकितना करे चीत्कार
तड़पाता उसे ज़ालिम सँसार
खरीदी बेचीं जाती
जूही बेला मोंगरा की कली
झूठी मुस्कान होंठो पर लिये
आखिर मुरझा जाती

जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
रेखा जोशी

Sunday, 20 August 2017

रिश्ते

देखे दुनिया कीभीड़ में
हमने
बिखरते रिश्ते
जीवन की भाग दौड़ में
सिसकते रिश्ते
छूटते रिश्ते

भाषा प्रेम की
कोई नहीं जानता
देखे
पत्थरों के शहर में
टूटते रिश्ते

रिश्ते रिश्ते
है देखे हमने
बनते बिगड़ते रिश्ते
छल फरेब
ईर्ष्या द्वेष से नहीं
प्यार और मुहब्बत से
हैं जुड़ते
और
संवरते रिश्ते

रेखा जोशी 

Saturday, 19 August 2017

वफ़ा की आस थी वह बेवफ़ा है

नहीं कुछ प्यार में अब तो रखा है
वफ़ा की आस थी वह बेवफ़ा है
,
दिखायें हम किसे यह ज़खम दिल के
रही अब ज़िन्दगी बन के सजा है
,
गिला शिकवा कभी कोई नहीं अब
सिला क्या प्यार का हमको मिला है
,
मिला है दर्द ही तो ज़िन्दगी में
जिगर में दर्द को हमने रखा है
,
हमें छोड़ा अकेला ज़िन्दगी ने
न जाने क्या हुई हमसे खता है
,
खिली है धूप आंगन में सभी के
लगाया रात ने डेरा यहां है
,
खता हमसे हुई वो माफ कर दे
पिया कदमों तले यह सर झुका है
,
कभी तुम फिर हमें मत याद करना
मिटाया नाम दिल पर जो लिखा है
,
निगाहों से पिलाया जाम तुमने
असर यह प्यार का कैसा हुआ है
,
मुझे तू  प्यार से इक बार तो मिल
जिगर दिल खोल कर अपना रखा है
,
नहीं चाहत हमें अब प्यार की पर
बता दें तू पिया क्या चाहता है

रेखा जोशी

Friday, 18 August 2017

थोथा चना बाजे घना


शांत  गहरे सागर रहते
झर झर झर झरने छलकते
,
ज्ञानी मौन यहां पर रहें
पोंगे पण्डित ज्ञान  देवें
,
थोथा चना बाजे घना
गुणगान करे अपना यहां
,
कुहू कुहूक कोयल गाए
राग गाता  कागा जाए
,
आधा अधूरा ज्ञान लिए
गुणों का अपने गान करे

रेखा जोशी

Wednesday, 16 August 2017

बहारें ज़िन्दगी में प्यार ले कर आप आयें है

विधाता छंद
1222. 1222. 1222. 1222

बहारें ज़िन्दगी में प्यार ले कर आप आयें हैं
कलम से खींच सपने आज काग़ज़ पर सजायें हैं
,
निगाहों में हमें तेरी दिखा है प्यार ही साजन
मिले जो तुम हमें तो फूल अंगना में खिलायें हैं
,
कहेंगे बात दिल की अब निगाहों ही निगाहों से
सजन अब बात दिल की हम यहां तुमको सुनायें हैं
,
खुशी अपनी पिया कैसे बतायें आज हम तुमको
पिया हम संग दिल में प्यार भर कर आज लायें हैं
,
हवाएं भी यहां पर आज हमको छेड़ती साजन
कहे जोशी नज़ारों  से पिया दिल में समायें है

रेखा जोशी

काली अँधेरी रात
छूटा साये  का भी साथ
धड़कता दिल कांपते हाथ

लगता क्यों
न जाने
कोई है मेरे साथ
चल रहा संग मेरे
जगाता दिल में मेरे
इक आस
रख कर हिम्मत
बढ़ता चल न डर
झाँक दिल में अपने
थरथराती लौ दिये की
दिखा रही राह
स्याह अँधेरे में
लेकिन
फिर भी रहा मेरा
धड़कता दिल कांपते हाथ

भीतर ही भीतर
हो रही उजागर
राह मंज़िल की
थामे अपनी साँसे
नहीं दी बुझने
वह थरथराती लौ
रखती रही पग अपने
संभल संभल कर
लेकिन
फिर भी रहा मेरा
धड़कता दिल कांपते हाथ

रेखा जोशी

Monday, 14 August 2017

कुकुभ छंद

 छंद कुकुभ
यह चार पद का अर्द्धमात्रिक छन्द है. दो चरणों के हर पद में 30 मात्राएँ होती हैं और यति १६,१४ पर होती है, पदां त में दो गुरु आते है।

हे माखनचोर नन्दलाला ,है मुरली मधुर बजाये 
धुन सुन  मुरली की गोपाला ,राधिका मन  मुस्कुराये
चंचल नैना चंचल चितवन, राधा को मोहन  भाये  
कन्हैया से  छीनी मुरलिया  ,बाँसुरिया  अधर लगाये

छंद पर आधारित मुक्तक 

हे माखनचोर नन्दलाला ,है मुरली मधुर बजाये 
धुन सुन  मुरली की गोपाला ,राधिका मन मुस्कुराये 
चंचल नैना चंचल चितवन,  गोपाला से प्रीत लगी
कन्हैया से छीनी मुरलिया  , बाँसुरिया अधर लगाये 

रेखा जोशी 

Sunday, 13 August 2017

हिंडोले

हिंडोले
संस्मरण ( कृष्ण जन्माष्टमी पर)

मै और मेरी दादी दोनों हर त्यौहार मिल कर अलग ही अंदाज में मनाया करते थे ।मै बहुत ही भाग्यशाली हूं कि मुझे अपनी दादी का भरपूर स्नेह मिला।बात  कृष्ण जन्माष्टमी की है ।अमृतसर का एक बजार जिसके कोने में एक कुआं है ,जो " सुनियारा वाला खुह" के नाम से जाना जाता है,उसी बाज़ार में हम किराए के मकान में रहा करते थे ,मै बहुत छोटी थी लेकिन उस घर की और बजार की अमिट  यादें अभी भी मेरे  मानस पटल पर अंकित है।हमारे घर के आस पास बहुत से मंदिर हुए करते थे , कृष्ण जन्माष्टमी पर सांझ ढलते ही  सभी मंदिर खूबसूरत लाइट्स से जगमगाने लगते थे, औरमै अपनी दादी की ऊंगली थाम कर एक मन्दिर से दूसरे ,और दूसरे से तीसरे ,घर के आस पास कितने भी मन्दिर हुआ करते थे, सभी मंदिरों में हिंडोले(झांकियां) देखने जाया करती थी

हिंडोले देख कर बहुत अच्छा लगता था,लेकिन उससे भी अच्छा लगता था हर झांकी में छुपी कृष्ण की लीलाओं की  कहानी ,जिसे मेरी दादी बहुत खूबसूरत अंदाज में सुनाया  करती थी  । जैसे ,कान्हा का जन्म ,माखन चुराना ,गोपियों को सताना,कलिया नाग मर्दन,जितनी झांकियां देखती उतनी ही कहानियां । मेरी दादी रात को कृष्ण के जन्म लेने के बाद ही प्रसाद ग्रहण करती थी,और तब तक उनकी कहानियों का सिलसिला चलता रहता था। देर रात को हम घर आते थे और मै कृष्ण की कहानियों में डूबी कब सो जाती थी पता ही नहीं चलता  था ।

रेखा जोशी

Friday, 11 August 2017

खुशी से गीत साजन गुनगुनाना है


हमे तो अब  ख़ुशी से खिलखिलाना है 
सुमन उपवन पिया अब तो खिलाना है
मिली  है  ज़िन्दगी अब  मुस्कुराओ तुम
ख़ुशी  से  गीत  साजन   गुनगुनाना  है 
,

मीत आज ज़िन्दगी हमें  रही पुकार है
रूप देख ज़िन्दगी खिली यहां बहार है
पास पास  हम रहें मिले ख़ुशी हमें सदा
छोड़ना न हाथ आज छा रहा खुमार है

रेखा जोशी 

Thursday, 10 August 2017

प्रीति की लौ जलाने की बात कर


प्रीत की लौ जलाने की बात कर
साजन  प्यार निभाने की बात कर
,
पल दो पल की ज़िन्दगी अब जी लें
यूं न अब दिल दुखाने  की बात कर
,
खुला आसमां  बुला  रहा है हमें
जहां से दूर जाने की बात कर
,
बहुत रोये है जीवन में हम अब
ज़िन्दगी  मुस्कुराने की बात कर
,
अाई है चमन में  बहारें सजन
अब गीत गुनगुनाने की बात कर

रेखा जोशी

Wednesday, 9 August 2017

जो रंग बदलते गिरगिट सा


देख उसकाभोला सा चेहरा
नही पहचान उसको पाया 
बना मीत मेरा 
और 
दिल का हाल उसे बताया
निकाला जनाज़ा 
विश्वास का मेरे 
जग में मेरा मज़ाक बनाया 
बन दोस्त  मेरा 
दुश्मन सा वो सामने आया 
भगवान बचाये ऐसे 
दोस्तों से 
जो रंग बदलते गिरगिट सा 

रेखा जोशी 

है रंग बिरंगी मेरी चाहतें

है रंग बिरंगी मेरी चाहतें
उड़ने लगी आसमां को छूने
,
होने लगी दिल में मेरे हलचल
कल्पनाओं संग लगा मचलने
,
पकड़ डोर गुब्बारों के संग संग
छूने चला आसमां उड़ते उड़ते
,
छेड़ा हवा ने बादल ने पकड़ा
पगला दीवाना लगा खेलने
,
प्रीत के तराने गाने लगा दिल
साज प्रेम के आज  लगे बजने

रेखा जोशी

Saturday, 5 August 2017

सच्चाई की राह

एकांकी

""सच्चाई की राह"

कलाकार
पहला,दूसरा(सूत्रधार) मसखरे
सत्यम एक आदमी
प्रेरणा  सत्यम की पत्नी

स्टेज पर दो मसखरों का प्रवेश

पहला, जब मैं छोटा बच्चा था
दूसरा,झूठ बोल कर बड़ी शरारत करता था,मेरा झूठ पकड़ा जाता और  माँ से डांट खाता था,मुझे समझाने के  लिए मां नई नई कहानियां सुनाया करती थी।
पहला, अच्छा,मुझे भी सुनाओ न कहानी
दूसरा ,हां  एक कहानी याद आई,एक गांव में एक लड़का रहता था  , वह हर रोज़ सुबह सुबह भेड़ बकरियां चराने जंगल जाया करता था।
पहला ,फिर क्या हुआ
दूसरा , एक दिन उस शरारत सूझी
पहला ,अच्छा ,फिर क्या हुआ
दूसरा , वह झूठ मूठ ही जोर जोर से चिल्लाने लगा
पहला (हैरानी से)चिल्लाने लगा
दूसरा , हां चिल्लाने लगा "शेर आया,शेर आया बचाओ बचाओ"
पहला, क्या  शेर आया (हैरानी से)
दूसरा, अरे ,इसमें हैरान होने  की क्या बात है,सचमुच में थोड़ा कोई शेर आया था, वह तो झूठ बोल कर गांव वालों को डरा रहा था।
पहला, ओह,फिर क्या हुआ
दूसरा, फिर गांव  वाले लाठियां ले कर  भागे भागे उसे बचाने जंगल  आए
पहला अच्छा ,फिर क्या हुआ
दूसरा ,हा हा हा ,वह जोर जोर से हंसने लगा,,और ताली  पीट पीट कर गाने लगा"बुद्धू बनाया बड़ा मज़ा आया,बुद्धू बनाया बड़ा मज़ा आया"
पहला ओह यह तो उसने अच्छा नहीं किया
दूसरा, हां , बिलकुल अच्छा नहीं किया, पता फिर एक दिन वहां सचमुच शेर आ गया और वह डर गया ,जोर जोर से चिल्लाया,बचाओ शेर आया शेर आया
पहला,तब तो गांव वाले फिर से उसे बचाने के लिए  भागे
भागे जंगल में आए होंगे
दूसरा,नहीं ,सभी ने यही सोचा कि वह झूठ बोल रहा है और कोई भी उस बचाने जंगल की ओर नहीं गया
पहला , ओओ ह,फिर क्या हुआ
दूसरा ,फिर क्या ,शेर उसे मार कर खा गया
पहला ,ओह ,झूठ बोलने के कारण बेचारे को अपनी जान से हाथ धोने पड़े
दूसरा,यह तो  बहुत ही बुरा हुआ उसके  साथ, अगर उसने झूठ न बोला होता तो गांव वाले उसे शेर से बचा लेते ।

स्टेज पर सत्यम और उसकी पत्नी प्रेरणा का प्रवेशके

प्रेरणा ,अजय मुझे तुम पर गर्व है क़ि मै तुम्हारी पत्नी हूँ,तुम्हारा तो नाम ही  सत्यम है जो सदा  सच का साथ देता है

सत्यम , हां प्रेरणा मेरी ज़िंदगी संघर्ष की एक लंबी दास्ताँ है,बचपन क्या होता है मैंने देखा ही नही ,पांच वर्ष की आयु में सर से बाप का साया उठ गया ,गरीबी क्या होती है मुझ से पूछो

प्रेरणा ,लेकिन आज तो तुम्हारे पास सब कुछ है

सत्यम,हां आज मेरे पास सब कुछ है ,
लेकिन इस सब के पीछे  मेरी मां है  जिसने मुझे बचपन से ही सदा सच्चाई की कहानियां सुना कर उसका महत्व बताया ।
प्रेरणा, सही कहा मां ही अपने बच्चो को सच्चाई का पाठ पढा सकती है।
सत्यम , आज यहां तक पहुंचने के लिए मैने इक लम्बा  रास्ता तय किया है ,गाँव की टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों से मीलों दूर स्कूल का रास्ता,स्कूल से कालेज और कॉलेज से यूनिवर्सिटी का रास्ता,बच्चों को ट्यूशन देना ,घर का खर्चा  ,विधवा माँ की देखभाल और छोटे भाई की पढ़ाई का खर्चा और सबसे उपर सच्चाई की राह पर चलते रहना।

प्रेरणा, जानती हूँ तुमने कभी सच का साथ नहीं छोड़ा ,ज़िन्दगी में अपने को टूटने नही दिया ,झूठ का दामन पकड़ कर पैसा नहीं कमाया।

पहला हां, हिम्मते मर्दे मददे खुदा
दूसरा ,भगवान उनकी मदद करते है जो अपनी मदद खुद करते है
पहला ,जीवन एक चुनौती है
दूसरा चुनौती का स्वागत करो
पहला ,जीवन एक संघर्ष है
दूसरा संघर्ष का स्वागत करो
पहला ,सच्चाई की राह पर बढ़ते चलो
दूसरा, सच्चाई की राह पर बढ़ते चलो

रेखा जोशी