Monday, 24 July 2017

खुशियाँ लेकर तब घर आँगनफिर आई नन्ही परी

याद है जब मिले थे हम तुम वो प्यारी सी मुलाकात
प्रीत तेरी  ने  दिल मे जगाये  थे   प्यार भरे जज़्बात
खुशियाँ लेकर तब घर आंगन फिर आई इक नन्ही परी
सारा जग अब जान गया है ,तेरी -मेरी-उसकी बात

रेखा जोशी

Saturday, 15 July 2017

मुक्तक

महिमा प्रभु की सदा मै गाती  रहूँ
शीश  अपना सदा मै  नवाती  रहूँ
जन जन  में  देखूँ  रूप मै  तुम्हारा
ख़ुशी सबके जीवन  में  लाती रहूँ
,

 है खिल खिल गये उपवन महकाते संसार
 फूलों  से  लदे  गुच्छे   लहराते  डार   डार
सज रही रँग बिरँगी पुष्पित सुंदर  वाटिका
भँवरें  अब   पुष्पों  पर  मंडराते  बार  बार

रेखा जोशी

Friday, 14 July 2017

सावन

सावन बरसा झूम के भीगा तन मन आज
पेड़ों   पर झूले पड़े  बजे   है मधुर  साज़
आई   बरसात  भीगे    से  अरमान लेकर
है भाया  आज भीगे  मौसम  का अंदाज़

रेखा जोशी

जाग जाओ देश मिलकर है बचाना

जाग जाओ देश मिलकर है बचाना
नींद में सोये हुओं को  है जगाना

साँस दुश्मन को मिटा कर आज लेंगे
साथ मिलकर है बुराई  को मिटाना

मिट गये है देश पर लाखो सिपाही
फौज की हिम्मत सभी को है बढ़ाना

देश के दुश्मन छिपें घर आज  अपने
पाठ उनको ढूँढ कर अब है पढ़ाना

दूर सीमा पर रहे सेना हमारी
पाक को अबतो सबक मिलकर सिखाना

रेखा जोशी

Thursday, 13 July 2017

गीतिका

गीतिका

( विजात छंद-1222 1222 समान्त-आई, पदांत-है )

घटा घनघोर छाई है
पिया की याद लाई  है
,
सखी झूले पड़े अँगना
सजन से अब जुदाई है
,
कहाँ हो  दूर तुम हमसे
यहाँ महफ़िल सजाई है
,
बिना तेरे  पिया अब तो
हमें  दुनिया न भाई है
,
मिला जब  प्यार जीवन मे
खुशी  भी संग  आई है

रेखा जोशी

है जननी जन्म भूमि हमारी

है जननी
जन्म भूमि हमारी
प्राणों  से भी
यह हमें प्यारी
अरे भारत उठ आँखे खोल
धरा रही है डोल
दुर्दशा देख किसानों की
इधर
मर रहे यहाँ वह
उधर
चले सीमा पर गोली
हाथ बंधे सिपाही के
और
पत्थरबाजी कश्मीर में
हद पार कर दी
आतंक के दरिंदों ने
मौत की नींद
सुला दिया
भोलेनाथ के भक्तों को
फड़क रही भुजाएं आज
खून खौलता रगों मेंअब
खुल गई पाक के
नापाक इरादों की अब पोल
अरे भारत! उठ ,आँखे खोल
देश अपना रहा बुला
अरे  भारत!उठ,आँखे खोल

रेखा जोशी

Sunday, 9 July 2017

गुरुवर महान

बहने लगी
ज्ञान की गंगा
आते ही
आषाढ़ मास की पूर्णिमा
शत शत करते
नमन
बांचते ज्ञान
गुरुवर महान
थे रचे वेद चारो
लबालब ज्ञान से
परम् ज्ञानी मुनि
व्यास ने
गुरु पूर्णिमा से
वन्दन कर प्रभु का
शत शत करते
नमन
प्रभु का
दिया जो हमे वरदान
गुरुवर भेजा धरा पर
राह दिखाता जीवन में
शत शत नमन
करते
गुरुवर का
मार्गदर्शक बन
जीना सिखाता
बारम्बार
नमन करते
गुरुवर महान
गुरुवर महान

रेखा जोशी

Thursday, 6 July 2017

गीतिका


मापनी  - 122   122. 122. 122

पिया आज तुमको मनाने चला हूँ
सदा साथ तेरा    निभाने  चला हूँ
,
सहारा  मिला आज तो  ज़िंदगी में
गिले औऱ शिकवे मिटाने  चला हूँ

नहीं अब बहारें   नज़ारे  नहीं अब
यहाँ फूल उपवन  खिलाने चला हूँ
,
भुला कर सभी गम यहाँ ज़िन्दगी में
सजन ज़िन्दगी अब बनाने चला हूँ
,
मिला साथ तेरा मिली आज मंज़िल
यहाँ आज   जीवन बिताने चला हूँ

रेखा जोशी

जीवन के पिया आया मौसम बहार का

जीवन में पिया   आया मौसम बहार  का
पूछे  वो  काश   हाल  दिले   बेकरार  का
बेशुमार सा नशा छाया रहे  अब  तो सदा
कर भी लो सजना आज इकरार प्यार का

रेखा जोशी

Wednesday, 5 July 2017

मेरी सतरंगी कल्पनायें

मेरी सतरंगी कल्पनायें

उड़ती गगन में
मेरी सतरंगी कल्पनायें
झूलती इंद्रधनुष पे
बहती शीतल पवन सी
ठिठकती कभी पेड़ों के झुरमुट पे
थिरकती कभी अंगना में मेरे
सूरज की रश्मियों से
महकाती  गुलाब गुलशन में मेरे
तितलियों सी झूमती
फूलों की डाल पे
दूर उड़ जाती फिर
लहराती सागर पे
चूमती श्रृंखलाएँ पर्वतों की
बादल सी गरजती कभी
चमकती दामिनी सी
बरसती बरखा सी कभी
बिखर जाती कभी धरा पे
शीतल चाँदनी सी
नित नये सपने संजोती
रस बरसाती जीवन में मेरे
मेरी सतरंगी कल्पनायें

रेखा जोशी

न हो हमसे खफा अब ज़िन्दगी में

तुझे चाहें सदा अब ज़िंदगी में 
न हो हमसे  खफा अब ज़िंदगी में

रहे तन्हा बिना तेरे सहारे
सताये गी वफ़ा अब ज़िंदगी में

बहुत रोये सनम तेरे लिये हम
नही कुछ भी कहा अब ज़िंदगी में

तड़प तुम यह हमारी देख ले अब
मिले जो इस दफा अब  ज़िंदगी में

न कर शिकवा बहारों से सनम तू 
नही वह  बेवफा अब ज़िंदगी में

रेखा जोशी

घन घन गरजता आया सावन
रिम झिम बरसता आया सावन
पहन   बरसाती ले   लो  छाता
मन को भी  बहुत भाया सावन

रेखा जोशी

Tuesday, 4 July 2017

आसमाँ से पकड़ सितारे यहाँ लायेंगे

आसमाँ  से   पकड़    सितारे  यहाँ   लायेंगे
सितारों  संग   आज  हम महफ़िल सजायेंगे
मिल   बैठेंगे   फिर  दोनों   उनके   संग संग
कुछ  उनकी  सुनेंगे   कुछ  अपनी  सुनायेंगे

रेखा जोशी

Monday, 3 July 2017

संस्मरण

संस्मरण

बात उन दिनों की है जब दिवाली से पूर्व हमारे  घर में सफेदी और रंगाई पुताई का काम चल रहा था ,मेरो आयु करीब दस वर्ष की होगी,,मेरे मम्मी पापा कुछ जरूरी काम से घर से बाहर गए हुए  थे ,पूरे घर का  सामान बाहर आँगन  में बिखरा हुआ था ,घर  के सभी कमरे लगभग खाली से थे और मेरे छोटे भाई बहन मस्ती में एक कमरे से दूसरे कमरे  में  छुपन छुपाई खेलते हुए इधर उधर शोर शराबा करते हुए भाग रहे थे,लेकिन मै सबसे बड़ी होने के नाते अपने आप को उनसे अलग कर लेती थी ,उन दिनों मुझे फ़िल्मी गीत सुनने का बहुत शौंक हुआ करता था ,बस जब भी समय मिलता मै  रेडियो से चिपक कर गाने सुनने और गुनगुनाने लग जाती थी ,उस दिन भी मै रेडियो पर कान लगाये गुनगुना रही थी।

उस कमरे में सामान के नाम पर बस एक ड्रेसिंग टेबल और एक मेज़ पर रेडियो था  जहां खड़े हो कर मै अपने भाई बहनों की भागम भाग से बेखबर मे संगीत की दुनिया में खोई हुई थी ,तभी बहुत जोर से धड़ाम की आवाज़ ने मुझे चौंका दिया ,आँखे उठा कर देखा तो ड्रेसिंग टेबल फर्श पर गिर हुआ था और उस  खूबसूरत आईने के अनगिनत छोटे छोटे टुकड़े पूरे फर्श पर बिखर हुए थे,वहां उसके पास खड़ी मेरी छोटी बहन रेनू जोर जोर से रो रही थी ,ऐसा दृश्य देख मेरा दिल भी जोर जोर से धडकने लगा था ,मै भी बुरी तरह से घबरा गई  थी ,एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा कहीं रेनू को कोई चोट तो नही आई ,लेकिन नही वह भी बुरी तरह घबरा गई थी ,क्योकि वह खेलते खेलते ड्रेसिंग टेबल के नीचे छुप गई थी और जैसे ही वह बाहर आई उसके  कारण  ड्रेसिंग टेबल का संतुलन बिगड़ गया और आईना फर्श पर गिर कर चकना चूर हो गया था ।

हम दोनों बहने डर  के मारे वहां से भाग कर अपने नाना के घर जा कर दुबक कर बैठ गई ,जो कि हमारे घर के पास ही था ,कुछ ही समय बाद ही वहां पर हमारी मम्मी के फोन आने शुरू हो गए और फौरन हमे घर वापिस आने के लिए कहा गया ,मैने रेनू को वापिस  घर चलने  के लिए कहा परन्तु वह डरी  हुई वहीं दुबकी बैठी रही ,बड़ी होने के नाते मुझे लगा कि हम कब तक छुप कर बैठे रहें गे ,हौंसला कर मै  घर की और चल दी और मेरे पीछे पीछे रेनू भी घर आ गई । जैसे ही मैने घर के अंदर कदम रखा एक ज़ोरदार चांटा मेरे गाल पर पड़ा ,सामने मेरी मम्मी खड़ी थी । मै हैरानी से उनका  मुहं देखती रह गई  ,''यह क्या गलती रेनू ने की और पिटाई मेरी '' बहुत गुस्सा आया मुझे अपनी माँ पर  जबकि गलती मेरी छोटी बहन से हुई थी ,बहुत रोई थी उस दिन मै ।

आज जब भी मै पीछे मुड़ कर उस घटना को याद करती हूँ तो फर्श पर बिखरे वो आईने के टुकड़े मेरी आँखों के सामने तैरने लगते है और अब मै समझ सकती हूँ कि अपने मम्मी पापा  की अनुपस्थिति में बड़ी होने के नाते मुझे अपने घर का ध्यान रखना चाहिए था ,मुझे अपनी बहन रेनू को ड्रेसिंग टेबल के नीचे छुपने से रोकना चाहिए था । वह चांटा मुझे मेरी लापरवाही के कारण पड़ा था। उस चांटे ने मुझे जीवन में अपनी जिम्मेदारी का अर्थ  समझाया था।

रेखा जोशी

दोहे सावन पर

दोहे [सावन पर ]

नभ पर बादल गरजते ,घटाएँ है घनघोर ।
रास रचाये दामिनीे  ,मचा  रही  है शोर ॥

आँचल लहराती  हवा ,पड़े ठंडी फुहार |
उड़ती जाये चुनरिया ,बरखा की बौछार ||

सावन बरसा झूम के ,भीगा तन मन आज ।
पेड़ों पर झूले पड़े ,, बजे है मधुर साज़ ॥

भीगा सा मौसम यहाँ  ,भीगी सी है रात ।
भीगे से अरमान है ,आई है बरसात ॥

कुहुक रही कोयल यहाँ, अम्बुआ डार डार।
हरियाली छाई रही,चहुँ ओर है बहार

रेखा जोशी

हिम्मत औऱ उम्मीद पर टिकी है ज़िन्दगी


अक्सर
जीवन के सफर में
होते है प्रयास असफल
चलता नही समतल
जीवन का रथ कभी
है रू ब रू होना
पड़ता कभी कभी
असफलता की
गहराइयों से भी
लेकिन
न छूटे आस कभी
विश्वास की नींव पर
मिलेगी
सफलता कभी
दो रूप है जीवन के
गर आज
खाई है गहराई
तो कल
मिलेगी ऊँचाई
हिम्मत औऱ उम्मीद पर
है टिकी
ज़िन्दगी

रेखा जोशी

Sunday, 2 July 2017

ग़ज़ल

प्रदत बहर- ख़फ़ीफ मख़बून महज़ूफ मक़तूअ

अर्कान- फाइलातुन मफाइलुन फेलुन
वज़्न-  २१२२/१२१२/२२

काफ़िया अर
रदीफ़- पर है

चल रहे  प्यार की डगर पर है
अब मिला प्यार ही  सफर पर है

है   हमें   इंतज़ार तेरा  अब
राह तेरी पिया  नज़र  पर है

हम कभी प्यार को नहीं भूले
चाहतें भी अभी मगर पर है

छोड़ना ना कभी हमें साजन
आज तो प्यार आप घर पर हैं

आप आ कर चले गये थे पर
प्यार अपना पिया अमर पर है

रेखा जोशी

माना था तुम्हे अपना गैरों को दिया सहारा

माना था तुम्हे अपना गैरों को दिया सहारा
अब किसे पुकारे न मिला हमे तेरा इक सहारा

चाहत  तेरी लिए भटकते रहे हम दर ब  दर
अच्छा किया जो तुमने कर लिया यूँ  किनारा

तन्हाई में तेरी तस्वीर से करते रहे बाते
चुरा लिया चैन दिल का क्यों चुपके से अब हमारा

यादों में आ कर अक्सर मुस्कुराते हो हमारी
छेड़  देते हो  दिल में  हमारे फिर  वही  तराना

रख लिया छुपा कर तुम्हे पलकों में अपनी हमने
देख लेंगे  जीवन  भर हम अब तो यही नज़ारा

रेखा जोशी

Thursday, 29 June 2017

बचपन

रखी है सम्भाल कर
बचपन की
कुछ निशानियाँ
छुपी है उन निशानियों में
अनेक कहानियाँ

अकेली है गुड़िया
टूटी फूटी सी
रचाई थी बचपन में
शादी जिसकी
आई थी बारात उसके
दूल्हे की
लौटा दी थी जो
बिन दुल्हन के
नही कर पाई विदा
प्यारी
अपनी गुड़िया को
कैसे कर पाती
जुदा उसे अपने से

था इक प्यारा सा बन्दर
खेलता था एक कुत्ते से
करती थी
बाते अपने दिल की
उनसे
छूट गया बचपन
छोड़ निशानियाँ
छूट गया बचपन
रह गई कहानियाँ

रेखा जोशी

चामर छंद गीतिका

छन्द- चामर
मापनी - 21 21 21 21 21 21 21 2 

मीत आज ज़िन्दगी हमें  रही पुकार है
रूप देख ज़िन्दगी खिली यहाँ बहार है
,
पास पास  हम रहें मिले ख़ुशी हमें सदा
छा रहा गज़ब यहाँ खुमार ही खुमार है

छोड़ना न हाथ साथ साथ हम चले सदा
प्रीत रीत जान ज़िन्दगी यहाँ हमार है
,
मिल गया जहाँ हमें मिले हमें सजन यहाँ
पा लिया पिया यहाँ करार ही करार है
,
दूर हम वहाँ चलें  मिले  जहाँ धरा गगन
प्यार से पुकार लो  मिला हमे सँसार है

रेखा जोशी

गीतिका

आधार छंद - सिन्धु 
मापनी - 1222 1222 1222 
गीतिका
समांत - आती, पदांत - है ।

सजन तेरी हमे जब याद आती है 
ख़ुशी रह रह पिया तब गीत गाती है 
.... 
मचल जाते यहाँ अरमान दिल में जब 
सुहानी रात भी तब गुनगुनाती है 
....
चले आओ पुकारें आज दिल मेरा 
चँदा की चाँदनी भी  अब बुलाती है 
.... 
पुकारे ज़िंदगी जी लो यहाँ हर पल 
सजन अब  ज़िंदगी भी मुस्कुराती है 
.... 
खिले है फूल पल दो पल चमन में अब 
बहारें आज साजन खिलखिलाती है 

रेखा जोशी 

गीत

गीत
झूला झूले श्याम देखो राधा के संग
है आया सावन कान्हा भीगे अंग अंग
……
आसमान में बदरा छाये जिया धड़काये
उड़ती जाये चुनरिया मन में प्रीत जगाये
बंसी मधुर बजाये कान्हा गोपियों के संग
झूला झूले श्याम देखो राधा के संग
है आया सावन कान्हा भीगे अंग अंग
……
रिम झिम बरसता पानी ठंडी पड़े फुहारें
रास रचायें कान्हा गोपियाँ उसे पुकारे
छनाछन बाजे पायल चूड़ी खनके खनखन
झूला झूले श्याम देखो राधा के संग
है आया सावन कान्हा भीगे अंग अंग
रेखा जोशी

Wednesday, 28 June 2017

बिन तेरे यह ज़िन्दगी वीरानी है

बिन तेरे यह ज़िन्दगी वीरानी है
रह गई अब यह अधूरी कहानी है
,
छाये हो इस कदर जीवन  में मेरे
तेरी यादें ही बस अब  सुहानी है
,
बसी है हमारी जान तुम में प्रियतम
आप से ही ज़िन्दगी में रवानी है
,
ख्यालों में तुम आकर सताया न करो
करते तुम सदा अपनी मनमानी है
,
कैसे बतायें हम हाल ए दिल अपना
क्या कहें जोशी तेरी दीवानी है

रेखा जोशी

Monday, 26 June 2017

टूट जो मोती गये उनको पिरो सकता नही

बहर- रमल मुसम्मन महज़ूफ़
अर्कान- फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
वज़्न-  2122. 2122. 2122. 212. 

काफ़िया का स्वर- ओ
रदीफ़- सकता नहीं

टूट जो मोती गये उनको पिरो सकता नही
ज़ख्म ऐसे अब मिले आंखे भिगो सकता नही
,
रात दिन हम याद करते है सदा  तुमको पिया
दर्द पाया इस कदर अब रात सो सकता नही
,
तुम हमारे प्यार को समझें नहीअब क्या करें
प्यार का देखा कभी जो ख्वाब खो सकता नही
,
बेवफा से प्यार हमने ज़िन्दगी  में क्यों किया
आँख में आँसू हमारे और रो सकता नही
,
रुक जाओ दूर हमसे तुम नही जाना सजन
ज़िन्दगी में प्यार हमसे दूर हो सकता नही

रेखा जोशी

Friday, 23 June 2017

बेवफाई तो उनकी भूल चुके थे ज़िन्दगी में

आसमान  में आज फिर काली घटा घिर आई है
जाने  क्यों आज  तेरी  याद दिल में फिर आई है
बेवफ़ाई तो   उनकी  भूल चुके  थे   ज़िन्दगी  में
मुद्द्त बाद  आज  हमारी  आँख क्यों भर आई है

रेखा जोशी

है गांव में रहते जो बन्धु भाई

गांव में रहते  जो बन्धु भाई है
देते हम उन को आज बधाई है
रूप बदल रहे है वोह भारत का
सुन्दर तस्वीर गांव की बनाई है

रेखा जोशी

यही तो है ज़िन्दगी

ज़िन्दगी
यही तो है ज़िन्दगी
कहीं धूप,छांव है कहीं
बहती धारा वक्त की
सुख दुख किनारों के बीच
जश्न मानते कहीं
कोई ढोते
गम का बोझ कहीं

ज़िन्दगी
यही तो है ज़िन्दगी
आज ख़ुशी का आलम
तो
कल मातम कहीं
फिर भी
थमती ज़िन्दगी नहीं
दामन में इसके
कोई हँस  रहा है
कोई रो रहा है
सफर ज़िन्दगी का
यूँही
चलता जा रहा है
चलता जा रहा है

रेखा जोशी

बीता ज़माना बचपन का


मुस्कुरा
उठे है फूल
मन उपवन में मेरे
याद
आते ही वोह
बीता ज़माना
बचपन का

टेढ़ी मेढ़ी
गाँव की पगडंडियाँ
लहलहाते हरे भरे
खेत
सोंधी सोंधी
माटी की महक
खिलखिलाती फसल संग
वोह
खिलखिलाता ज़माना
बचपन का

भरी दोपहरी में
घर के आंगन में
मिल कर नित
खेल नये नये खेलना
गिल्ली डंडा
चोर सिपाही
गोल गोल घूमते
लट्टू से
मचलता मन
याद आता है बहुत
वोह
मचलता  ज़माना
बचपन का

बरसाती पानी की
लहरों में
वोह
कागज़ की नाव का
लहलहराना
हिलोरे देता
मन उपवन को मेरे
याद आता है बहुत
वोह
बीता ज़माना
बचपन का

रेखा जोशी

Wednesday, 21 June 2017


है  होती  सास    बहू में   तकरार
फिर भी करती वह आपस मे प्यार
एक का बेटा तो दूसरी का पति
जुड़े जिससे उनके दिलों के तार

रेखा जोशी

Monday, 19 June 2017

पिता


दुनिया की भीड़ में भरे जाने कितने तक्षक
रक्षा करे हमारी हर मोड़ पर  पिता रक्षक
है सिखाता चलना हमे वह जीवन के पथ पर
जीवन की अनजानी राहें पिता मार्गदर्शक

रेखा जोशी

Saturday, 17 June 2017

पापा जैसा कोई नहीं ,पूर्वप्रकाशित रचना

अमृतसर के रेलवे स्टेशन पर गाड़ी से  उतरते ही मेरा दिल खुशियों से भर उठा  ,झट से ऑटो रिक्शा पकड़ मै अपने मायके पहुंच गई,अपने बुज़ुर्ग माँ और पापा को देखते ही न जाने क्यों मेरी आँखों से आंसू छलक आये , बचपन से ले कर अब तक मैने अपने पापा के घर में सदा सकारात्मक उर्जा को महसूस किया है ,घर के अन्दर कदम रखते ही मै शुरू हो गई ढेरों सवाल लिए ,कैसो हो?,आजकल नया क्या लिख रहे हो ?और भी न जाने क्या क्या ,माँ ने हंस कर कहा ,''थोड़ी देर बैठ कर साँस तो ले लो फिर बातें कर लेना ''| अपनी चार बहनों और एक भाई में से  मै सबसे बड़ी और सदा अपने पापा की लाडली बेटी रही हूँ ,शादी से पहले कालेज से आते ही घर में  जहाँ मेरे पापा होते थे मै वहीं पहुंच जाती थी और जब तक पूरे दिन का लेखा जोखा उन्हें बता नही देती थी तब तक मुझे चैन ही नही पड़ता था | मै और मेरे पापा न जाने कितने घंटे बातचीत करते हुए गुज़ार दिया करते थे ,समय का पता ही नहीं चलता था और मेरी यह आदत शादी के बाद भी वैसे ही बरकरार रही ,ससुराल से आते ही उनके पास बैठ जाती थी लेकिन मेरी मम्मी हमारी इस आदत से बहुत परेशान हो जाती थी ,वह बेचारी किचेन में व्यस्त रहती और मै उनके साथ घर के काम में  हाथ न बंटा कर अपने पापा के साथ गप्प लगाने में व्यस्त हो जाती थी ,लेकिन आज अपने पापा के बारे में लिखते हुए मुझे बहुत गर्व हो रहा है कि मै एक ऐसे व्यक्ति की बेटी हूँ जिसने जिंदगी की चुनौतियों को अपने आत्मविश्वास और मनोबल से परास्त कर सफलता की ओर अपने कदम बढ़ाते चले गए |

मात्र पांच वर्ष की आयु में उनके पिता का साया उनके सर के ऊपर से उठ गया था और मेरी दादी को अपने दूधमुहें बच्चे ,मेरे चाचा जी के  साथ अपने मायके जा कर जिंदगी की नईशुरुआत करनी पड़ी थी जहां उन्होंने अपनी अधूरी शिक्षा को पूरा कर एक विद्यालय प्रचार्या की नौकरी की थी और मेरे पापा अपने दादा जी की छत्रछाया में अपने गाँव जन्डियाला गुरु ,जो अमृतसर के पास है ,में रहने लगे | उस छोटे से गाँव की छोटी छोटी पगडण्डीयों पर शुरू हुआ उनकी जिंदगी का सफर ,मीलों चलते हुए उनकी सुबह शुरू होती थी ,वह इसलिए कि उनका स्कूल गाँव से काफी दूर था ,पढ़ने में वह सदा मेधावी छात्र रहे थे  और इस क्षेत्र में उनके मार्गदर्शक रहे उनके चाचाजी जी जो उस समय एक स्कूल में अध्यापक थे | दसवी कक्षा  से ले कर बी ए  की परीक्षा तक उनका नाम मेरिट लिस्ट में आता रहा था ,बी ए की परीक्षा में उन्होंने  पूरी पंजाब यूनिवर्सिटी में तृतीय स्थान प्राप्त कर अपने अपने गाँव का नाम रौशन किया था |धन के अभाव के कारण,पढ़ने के साथ साथ वह ट्यूशन भी किया करते थे ताकि मेरी दादी और चाचा जी की जिंदगी में कभी कोई मुश्किलें न आने पाए | दो वर्ष उन्होंने अमृतसर के हिन्दू कालेज में भौतिक विज्ञान की  प्रयोगशाला में सहायक के पद पर कार्य किया और आगे पढ़ाईज़ारी रखने के लिए धन इकट्ठा कर अपने एक प्राध्यापक प्रो आर के कपूर जी की मदद से आदरणीय श्री हरिवंशराय बच्चन के दुवारा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के भौतिकी विभाग में एम् एस सी पढ़ाई के लिए प्रवेश लिया |अपने घर से दूर एम् एस सी की पढ़ाई उनके लिए एक कठिन चुनौती थी,यहाँ आ कर मेरे पापा का स्वास्थ्य बिगड़ गया ,किसी इन्फेक्शन के कारण वह ज्वर से पीड़ित रहने लगे और उप्पर से धन का आभाव तो सदा से रहता रहा था ,इसलिए यहाँ पर भी वह पढ़ने के साथ साथ ट्यूशन भी करते रहे जिसका सीधा असर उनकी पढ़ाई पर पड़ा ,जैसे तैसे कर के वह प्रथम वर्ष के पेपर दे कर वापिस अमृतसर आगये |इसी समय मेरी मम्मी इनकी जिंदगी सौभाग्य ले कर आई .मेरे  चाचा जी  बैंक में नौकरी लगने के कारण पापा घर परिवार कि ज़िम्मेदारी माँ पर छोड़ कर अपनी पढ़ाई का द्वितीय वर्ष पूरा करने वापिस इलाहाबाद चले गए,उसके बाद अमृतसर के हिन्दू कालेज में लेक्चरार के पद पर आसीत हुए ,उसी कालेज में हेड आफ फिजिक्स डिपार्टमेंट बने औऱ वाइस प्रिंसिपल के पद से रिटायर्ड हुए |उसके बाद वह लेखन कार्य से जुड़ गए ,हिंदी साहित्य में उनकी सदा से ही रूचि रही है ,उन्होंने श्रीमद्भागवत गीताका पद्धयानुवाद  किया,उनके दुवारा लिखी गई पुस्तके , मै तुम और वह ,तुम ही तुम ,आनंद धाम काफी प्रचलित हुई और उन्हें कई पुरुस्कारों से भी सम्मानित किया गया |

पापा हम सभी बहनों और भाई के गुरु ,पथप्रदर्शक और मित्र रहें है ,उन्ही की दी हुई शिक्षा ,प्रेरणा और संस्कार है जिसके चलते हम सभी ने नौकरी के साथ साथ बहुत सी उपल्ब्दियाँ भी हासिल की है |इस वृद्धावस्था में भी उनका मनोबल बहुत ऊंचा है ,आज भी अपने कार्य वह स्वयम करना पसंद करते है ,मेरी  ईश्वर  प्रार्थना है वह सदा स्वस्थ रहे और अपना लेखन कार्य करते रहे |

रेखा जोशी

सभी वो तोड़ बन्धन अब उड़े हैं आसमानों में
परिंदे कब रहा करते हैं हर दम आशियानों में
...
न रोको तुम न बांधों आज ज़ंजीरें यहाँ पर तुम
रहेंगे कब तलक छुप कर परिंदे इन मकानों में
....
कहीं तुम दूर उड़ जाना बसा लेना नया घर फिर
न रोकेंगे चले जाना नयें अपने ठिकानों में
....
न भरना आँख में आँसू न मुड़ कर देखना हम को
चले जाना यहाँ से दूर खोये तुम उड़ानों में
....
सदा तेरे लिये हमने खुदा से प्यार ही माँगा
करेंगे याद हम तुमको सदा अपने फसानों में

रेखा जोशी

महालक्ष्मी 'मापनीयुक्त वर्णिक छंद
212 212 212

साथ तेरा मिला जो पिया
आज लागे नहीं  है जिया
पास  आओ  हमारे अभी
काश आ के न जाओ कभी
....
देख के रूप तेरा पिया
चाँद भी आज शर्मा गया
रात को रौशनी है मिली
मीत मै  संग तेरे चली
....
है ख़ुशी आज गाते  रहें
ज़िन्दगी जाम पीते रहें
प्रीत को  तोड़ जाना नही
छोड़ना साथ आता नही
,
बाग में अब कली है खिली
जिंदगी में   खुशी है  मिली
साथ  तेरा  हमें  जो  मिला
ज़िन्दगी से नही अब गिला
,
प्यार अब ज़िन्दगी से मिला
अब चलेगा यही सिलसिला
मीत  आये  यहां   ज़िन्दगी
गीत  गाये  यहां    ज़िन्दगी

रेखा जोशी

Friday, 16 June 2017

नाम ले कर पिया करते जाप


नाम ले कर पिया करते जाप
नही मिले फिर भी साजनआप
जब से गये तुम छोड़ कर हमें
जीवन हमारा बना अभिशाप

रेखा जोशी

Tuesday, 13 June 2017

दो मुक्तक

स्तुति

गौरीपुत्र  हे   विघ्नेश्वर   करें   तेरा ध्यान
विघ्नहर्ता   विघ्न   हरो   हम  तेरी सन्तान
स्तुति   वन्दन  कर शीश झुकाते   अपना
बुद्धि में आन विराजो मिले विद्या का ज्ञान
,
निन्दा

बुद्धि बल दिया सभी कुछ भगवान
न करना तुम   किसी  का अपमान
निन्दा किसी की कभी   न कीजिये
है  ईश्वर   की  हम  सभी   सन्तान

रेखा जोशी

Monday, 12 June 2017

झूमता सावन

चलती  ठंडी हवायें झूमता सावन आया
नभ गरजे  बदरा  बिजुरी लहराये
अब छाई हरियाली  मौसम है मन भाया
नाचे मोर आंगन में जियरा हर्षाये
झूला झूलती सखियाँ  गाती कोयलिया गीत
पिया गये परदेस  लागे नाहि जियरा
बरसा पानी नभ से पपीहा गुनगुनाया
आये याद प्रियतम है गोरी शर्माये

रेखा जोशी

रखें देश का मान है प्यारे


रखें देश का मान है प्यारे
दे कर अपनी जान है प्यारे

गोला बारूद आग है सब
मौत का सामान है प्यारे
,
है साया आतंक का छाया
दहशत में अब जान है प्यारे
,
घुस आये आतंकी शहर में
सड़कें अब सुनसान है प्यारे
,
देश की खातिर अब मर मिटना
होना अब कुर्बान है प्यारे

रेखा जोशी