Thursday, 29 January 2015

गरल पी कर नीलकंठ शिव कहलाये


जीवन में गरल सुधा मिल के हम पियें 
स्वाती अमृत सी सुधा पी के सब जियें 
गरल  पी  कर  नीलकंठ शिव कहलाये 
जी रहे हम  विष कंठ धारण कर लिये 

रेखा जोशी 

Wednesday, 28 January 2015

प्यार में अब सनम हर ख़ुशी मिल गई

गीतिका
मापनी ---2  1 2 2 1 2   2 1 2 2 1  2
पदांत----अगी  मिल  गई
समांत -----अ

प्यार में अब सनम हर ख़ुशी मिल गई
ज़िंदगी  की  कसम  ज़िंदगी  मिल गई

तुम  मिले  छा   गई  अब  बहारें   यहाँ
हसरतों  को  बलम  ज़िंदगी  मिल  गई

मिल गया  है  खुदा  जो मिले तुम हमें
तुम  मिले तो  गज़ब  बंदगी  मिल गई
....
खूबसूरत    नज़ारे    पुकारे    हमे
देख  इन को  अजब  ताज़गी मिल गई

 खो  गये  देख  मासूम  सा चेहरा
प्यार में अब  सजन  सादगी मिल गई

रेखा जोशी 

जा रहे हो दूर हमसे तुम बहुत

अब  तुझे अपना सजन मै  प्यार दूँ 
जान तुझ  पर बस सजन  मै वार दूँ 
जा   रहे   हो  दूर  हमसे  तुम  बहुत 
आज   साजन  प्यार  का  उपहार दूँ 

रेखा जोशी 

Tuesday, 27 January 2015

मत खेलो कुदरत से खेल

काटो पेड़
जंगल जंगल
मत खेलो
कुदरत से खेल
कर देगी अदिति
सर्वनाश जगत का
हो जायेगा
धरा पर
सब कुछ फिर मटियामेल
कुपित हो कर
प्रकृति भी तब
रौद्र रूप दिखलाएगी
बहा ले जायेगी सब कुछ
संग अपने जलधारा में
समा जायेगा
जीवन भी उसमे
कुछ नही 
बच पायेगा शेष 
फिर
कुछ नही
बच पायेगा शेष

रेखा जोशी

न कोई था हमारा यहाँ पर

दूर हमसे जब किनारे हो गये
बदरंग सब जब नज़ारे हो गये
न  कोई  था  हमारा  यहाँ  पर
हमारे   तुम   सहारे    हो  गये

रेखा जोशी 

Sunday, 25 January 2015

आंच न देंगे आने कभी आज़ादी पे हम

सीमा  पर   सेनानी   लड़ने  को  तैयार  है
शान  तिरंगे  की  हम  रखने  को  तैयार है
आंच न  देंगे  आने  कभी आज़ादी  पे  हम
देश  के  लिये हम  मर मिटने को तैयार है

रेखा जोशी

बस यही इक पल

आगोश अपने में
ले रही
मौत हर पल
अब जो है पल
मिट रहा
जा चुका वह
काल में
आ रहा फिर
नव पल
तैयार है मिटने को 
वह  पल 
पल पल
मिट रही यह ज़िंदगी
है जो अपना
बस यही इक पल
कर ले पूरी
सभी चाहते
बस इसी 
इक पल में
है संवार सकता
जीवन
बस यही इक पल

रेखा जोशी

Saturday, 24 January 2015

सभी मित्रों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

सभी मित्रों को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

वन्देमातरम
भारत माता की जय

आँचल में बीता बचपन जननी जन्म भूमि 
लुटा दूँगा जान तुझ पर जननी जन्म भूमि 
तिलक इस पावन माटी का  माथे सजा  लूँ 
है  माटी बहुत अनमोल जननी  जन्मभूमि
जयहिन्द 


रेखा जोशी

हाइकु मुक्तक


है कष्टकारी /  न लालच करना /ये  बुरी बला 
खुश रहना /क्रोध नही करना /चेहरा खिला 
करे विनाश /,क्रोध , ईर्ष्या , लालच, / दुख की खान
धैर्य रखना /नही ईर्ष्या द्वेष /सन्तोष मिला 

रेखा जोशी 

वीणावादिनी स्वरों की देवी

हे   माँ    शारदे  हमें  वरदान  दे
ज्योति से अपनी तू हमें ज्ञान दे
वीणावादिनी   स्वरों   की   देवी
हे  माँ  विद्द्या का  हमें  दान  दे

रेखा जोशी


Friday, 23 January 2015

सभी मित्रों को बसन्त पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ


सूरज की तरह पीली पीली सरसों चमकने लगी
मुस्कुराती सब ओर खुशियां देखो चहकने लगी
रंग  बिरंगे  फूलों  से अब  धरा  पर  आई  बहार
बसंत के आगमन से बगिया मेरी महकने लगी

रेखा जोशी


जीना देश के लिये मरना देश के खातिर


सीमा  पर   सेनानी   लड़ने  को  तैयार  है
शान  तिरंगे  की  हम  रखने  को  तैयार है
जीना  देश  के लिये मरना  देश के खातिर
देश  के लिये हम  मर मिटने को तैयार है

रेखा जोशी



ब्रहमांड जीतने को आज हो रहा मानव बेताब

मिल रहा
विज्ञानं से 
नित नया ज्ञान
मिटा दी सीमायें विश्व की 
सिमट रहे सब 
आज 
मिला विज्ञानं का आशीर्वाद 
हुआ धन्य मानव 
खोज रहा दुनिया नई 
भर रहा उड़ान 
दूर अंतरिक्ष में 
नही  दूर 
अब 
चन्द्र शुक्र और मंगल 
ब्रहमांड जीतने  को 
आज 
हो रहा मानव 
बेताब 
जय जय 
हे मानव महान 
जय जय 
हे मानव महान 

रेखा जोशी 

Thursday, 22 January 2015

थक कर कहीं तुम रुक न जाना न समझना जीवन को भार

माना गम की रात लम्बी है सो जा तू चादर को तान
उषा किरण सुबह को जब आए बदल जाये समय की धार
थक कर कहीं तुम रुक न जाना न समझना जीवन को भार
मंजिलें मिलें गी आगे बहुत मिले गी तुम को नयी राह

रेखा जोशी 

Wednesday, 21 January 2015

न छोड़ना साथ तुम

है विश्वास
इतना तुम पर मुझे
हूँ जानती
तुम साथ हो मेरे
कर दी हवाले तेरे
जीवन की नैया
ऊँची  नीची लहरों में
डोल रही नैया
दे दी हमने
पतवार हाथ में तेरे
कभी भी
न छोड़ना साथ तुम
रहना सदा पास तुम
प्रभु है तेरी  आस
लगा दोगे तुम
नैया मेरी पार

रेखा जोशी 

मुखौटों के भीतर छिपा चेहरा

तुम कौन
पहचानते खुद को
मुखौटों के भीतर छिपा चेहरा
क्यों नही स्वीकारते
इस सत्य को
क्यों झुठला रहे स्वयं को
कर पाते अंतर जो
सत्य असत्य में
उषा निशा में
उजाले अंधकार में
दिन रात में
छोड़ तमस निकालो खुद को
 समझ लो
जिस दिन तुम
स्वीकारो गे खुद को
पहचान पाओगे तुम अपने
वास्तविक रूप को
लौट आयेगी
फिर से तुम्हारी
अपनी पहचान

रेखा जोशी



Tuesday, 20 January 2015

छलकता है अमृत बूँद बूँद से

करें   गंगा  मैया  को  हम नमन
आँचल  में  तेरे   रहा  बस  वतन
छलकता  है अमृत   बूँद   बूँद से
सींचा  भारत को बहुत कर यत्न
रेखा जोशी



बहुत सह लिया हमने दर्द ए मुहब्बत सजन

बातें   तुम्हारी   सुबह ओ  शाम  कर  रहा  हूँ
मुहब्बत  अपनी   अब  सरेआम  कर  रहा हूँ
बहुत सह लिया हमने  दर्द ए मुहब्बत सजन
ज़िक्र  अपनी  हसरतों का  तमाम कर रहा हूँ

 रेखा जोशी


बिटिया हमारी [क्षणिका ]


क्षणिका 

बिटिया हमारी 
अब बड़ी हो गई 
कुछ ज़िद्दी 
कुछ नकचढ़ी हो गई 
मोह लेती 
मन को हँसी उसकी 
जादू की वह छड़ी ही गई 
कदम से कदम 
मिला कर मेरे 
वह खड़ी हो गई 
सपने मेरे उसी के लिये 
संवारना उसे 
मेरी ज़िंदगी हो गई 

बबिता शर्मा 




क्षणिका

क्षणिका

 बेटी के
आगमन से
महकने लगा अंगना मेरा
दर्द भी हुआ सीने में
छोड़ कर अपनों को
हो जायेगी पराई
इक दिन

रेखा जोशी


Monday, 19 January 2015

लहरों सी रवानी हो जीवन में


है मदमस्त लहराना लहरों सा
किनारों  से टकराना लहरों सा
लहरों सी  रवानी  हो जीवन में
गाते  रहें हम  गाना लहरों  सा

रेखा जोशी 

Sunday, 18 January 2015

उड़ने लगी अब चाहतें लिए संग कई रंग

सुहानी चांदनी  से यह  भीगता मेरा तन 
हसीन ख्वाबों के पंखों से उड़ता मेरा मन
उड़ने लगी अब चाहतें लिए संग कई रंग
नाचे यह मन मयूरा बांवरा हुआ तन मन

रेखा जोशी 

दान धर्म कर अपना जीवन सफल कर ले

दुनिया तो  छलावा दिन  जीवन के चार
है  दीन दुखी बहुत  सबसे  कर ले  प्यार
दान धर्म कर अपना जीवन सफल कर ले
छोड़  सब  यहाँ  पर जाना प्रभु के  द्वार

रेखा जोशी

बदल देती ज़िंदगी हमारी तुम्हारी



अन्धकार को प्रकाशित
करती
सूरज की किरणे
जगत में उजियारा
फैलाती
सूरज की किरणे
ज़िंदगी हमारी तुम्हारी
मन आत्मा को भी
प्रकाशित करती
सत्य की किरणे
पढ़ ली बहुत पुस्तक पोथी
लेकिन ऊर्जा से कर देती
परिपूर्ण हमें
एक किरण सत्य की
बदल देती  ज़िंदगी
हमारी तुम्हारी
एक किरण सत्य की

रेखा जोशी 

Saturday, 17 January 2015

झूठ का पलड़ा भारी


सत्य वचन की मारी दुखिया  वह बेचारी 
सत्य को अपना रही वह थक कर अब हारी 
झूठ का दामन छोड़ कर अब सच की खातिर 
मर मिटी वह लेकिन झूठ का पलड़ा भारी 

रेखा जोशी 

Friday, 16 January 2015

तेते पाँव पसारिये जेती लंबी सौर [हास्य व्यंग्य ]


[हास्य व्यंग्य ]

मुस्कुराते हुए 
जब लेखा  जोखा 
क्रेडिट कार्ड का 
पोपट लाल के हाथ में 
श्रीमती जी ने 
थमाया 
देखते ही उसे 
पोपट लाल की 
आँखों के आगे 
अन्धेरा सा छाया
देख उसे लगा 
ज़ोरों का झटका उन्हें 
झाँक  पत्नी की आँखों में 
पोपट लाल चिल्लाये 
ऊल जलूल खरीदारी करने का 
दिया सुझाव तुम्हे
किसने 
इतनी क्यों खींची चादर 
तुमने 
फटेहाल बनाया हमें 
आगे से 
इस बात का करना गौर 
तेते पाँव पसारिये जेती लंबी सौर

रेखा जोशी 










Thursday, 15 January 2015

हाइकु [रोती सच्चाई ]


हाइकु [रोती सच्चाई ]

माँ के संस्कार
सत्य होता विजयी
झूठ की हार
......................
जगत यह
सब है विपरीत
जीता असत्य
....................
पाप फलता
पुण्य मांगता भीख
शोषण यहाँ
....................
 रोज़ मरता
ईमानदार यहाँ
झूठा फलता
...................
रोती सच्चाई
झूठ का बोल बाला
देती दुहाई

रेखा जोशी 

Wednesday, 14 January 2015

रहने लगे अब दिल में तुम ही तुम


जब से तुम घर  में आये हमारे 
नाम से बढ़ती धड़कने  तुम्हारे 
रहने लगे अब दिल में तुम ही तुम 
है नयन हमारे  सपने  तुम्हारे 

रेखा जोशी 

सवार सात घोड़ों पे अलौकिक लालिमा लिये

उतर रहा नील  नभ पर सातवें आसमान से 
है थिरकती  रश्मियाँ दिवाकर चमके शान से 
सवार सात घोड़ों पे अलौकिक लालिमा लिये
स्फुरित है तन मन प्रकाशित सब हुऐ जहान में

रेखा जोशी 

सब कुछ खत्म हुआ है साजन इधर यहाँ पे [ग़ज़ल ]


अब  ढूंढ क्या रहा है  साजन  इधर यहाँ पे 
सब कुछ खत्म हुआ है साजन इधर यहाँ पे 

धोखा मिला हमे तो ऐसा  नसीब से अब 
कुछ भी नही बचा है  साजन इधर यहाँ पे 
… 
तुम प्यार को नही समझे जब सनम कभी भी 
क्यों दी हमे सज़ा है साजन इधर यहाँ पे 
… 
यह ज़िंदगी हुई  अब  बेज़ार बिना तेरे 
पाई न जब वफ़ा है  साजन इधर यहाँ पे 
… 
हमने  गुनाह क्या कर डाला सजन बता दे 
अब क्या हुई  खता है साजन इधर यहाँ पे 

रेखा जोशी 

मकर सक्रांति की हार्दिक शुभकामनायें


सूरज  नमस्कार  कर  जीवन  सफल  बनायें
हर्षोल्लास  से   नभ  पर  पतंग   हम   उड़ायें
दान करें हम खिचड़ी गुड तिल का  सभी जन
मकर    सक्रांति   की  हार्दिक  शुभकामनायें

रेखा जोशी 

Tuesday, 13 January 2015

पत्थर की बैसाखियाँ

संवेदनाएं कहीं
गुम हो गई
अब
रिश्तों की गली में
बने
हृदय पाषाण
पाषाण चेहरों पर
खिंची रेखाएँ
मुस्कान की
पत्थर हुई भावनाएँ
आहत करती मन
लहूलुहान होते
रिश्ते
पत्थर की
बैसाखियाँ लिये
चल रहे
है यहाँ

रेखा जोशी



Monday, 12 January 2015

हसरतें रह जाती यहाँ पर अधूरी ही


जीना  यहाँ  इतना  आसान  नही होता
ज़िंदगी  में   पूरा   अरमान   नही  होता
हसरतें   रह जाती यहाँ   पर अधूरी   ही
कहीं ज़मीन  कही  आसमान नही होता

रेखा  जोशी 

दिल के जज़्बात अपनी भीगी पलकें हम है छिपाये

दिल के  जज़्बात अपनी  भीगी पलके हम है छिपाये
 हाल ऐ दिल अपना अब  हर किसी से हम है छिपाये
 सोचा  कभी  न  दोगे  दगा  माना सदा तुम्हे अपना
गैरों   की  क्या  कहें  अपने  भी  हुए   अब  है  पराये

रेखा जोशी



Sunday, 11 January 2015

मीत बन साथ मेरा निभाना प्रभु


मन में प्रेम की जलती ज्योति  रहे
मिले  तुमसे  सदा हमें  शक्ति रहे
मीत  बन साथ मेरा  निभाना प्रभु
चरणो  में  तेरे   सदा   भक्ति  रहे

रेखा जोशी

Saturday, 10 January 2015

करूँ चाहे जितना भी गुस्सा सोऊं कभी न भूखे पेट [हास्य कविता ]

करूँ चाहे जितना भी गुस्सा  सोऊं कभी न भूखे पेट [हास्य कविता ]

प्यारी श्रीमतीजी से
करके  झगड़ा हम
बैठ गये धरने पर
गलती से हम
भूखे पेट हो गई रात
सो गये  गप्पू पप्पू
और
सो गई श्रीमती  भी
 चूहों ने तब
मचाई पेट में उछल  कूद
कुछ ऐसी
मारे  भूख के हुआ हाल बेहाल
नींद आँखों से कोसो दूर
रह रह कर आये हमे
तब 
गर्मागर्म रोटी की याद
तैरने लगे आँखों में
भांति  भांति के स्वादिष्ट पकवान
मटर पनीर मलाई कोफ्ता
मुहं में हमारे
भर आया पानी
रसोई में फिर घुसे हम
धीरे धीरे दबे पाँव
था अँधेरा घनघोर वहां
जा टकराये अलमारी से
छनाछन का राग अलापा
बर्तन ज़मीं से टकराये
चोर चोर का शोर मचाते
गप्पू पप्पू दौड़े आये
आगे आगे हम भागे
पीछे गप्पू पप्पू आये
सामने से आ धमकी
हमारी प्यारी श्रीमती जी
नीचीआँखे  कर हमने
किया कबूल अपना अपराध
खाई कसम
न लूँगा पंगा
करूँ चाहे जितना भी गुस्सा
सोऊं कभी न भूखे पेट


रेखा जोशी








श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर

सन 1965 ,जब जम्मू कश्मीर में भारत पाक सीमा पर युद्ध का शंखनाद बज चुका था ,एक रात अमृतसर में अपने घर के आंगन में मै अपने परिवार के संग गहरी नींद में सोई हुई थी तब उपर आसमान को चीरते हुए दो लड़ाकू विमान एक के पीछे दूसरा तेजी से रात की नीरवता भंग करते हुए निकल गए लेकिन नीचे जमीन पर हम सब के दिलों की धडकने बढ़ा गए ,चौंक कर हम सब अपने बिस्तरों से उठ कर बैठ गए , कुछ ही देर बाद जोर से रुक रुक कर खतरे का साइरन बज उठा तभी मेरे पापा ने कहा ,”जंग शुरू हो गई ”,हम सब जल्दी से अंदर कमरों की तरफ भागे और तत्काल सारे घर की बत्तिया बंद कर दी |अमृतसर जो भारत और पकिस्तान की सीमा रेखा पर स्थित है, वहां सीमा पर दोनों देशों की ओर से दनादन चल रही गोलियों के धमाकों से थर्रा उठा था ,उसकी धमक हमारे घर की खिड़कियाँ और दरवाजों तक पहुंच रही थी ,वह काली रात देखते ही देखते आँखों ही आखों में कट गई |


सुबह हर रोज़ की तरह मै तैयार हो कर कालेज पहुंची तो वहाँ का नजारा देखने लायक था , छात्रों में देशभक्ति का जोश हिलोरे मार रहा था ,,”भारत माता की जय , शास्त्री जी अमर रहें ‘के नारे चारो ओर गूँज रहे थे ,तभी किसी ने हमे यह समाचार सुनाया ,”भारतीय फौजे आगे बढ़ रहीं है ”यह सुनते ही हम सबके चेहरों पर ख़ुशी की लहर दौड़ उठी ,”अरे वाह अब तो दोपहर का भोजन लाहौर में करेंगे ”किसी एक छात्र की आवाज़ कानों में पड़ी | ऐसी एकता ,ऐसा देश भक्ति का जस्बा था उस समय लोगों में ,लाल बहादुर शास्त्री जी हम सब भारतवासियों के आदर्श नेता बन चुके थे ,उनकी एक आवाज़ पर लोग अपनी जान तक नौछावर करने को तैयार थे ,इस देख की रक्षा करने वाले फौजी भाइयों को देश की नारियाँ राखियाँ बाँध कर जंग के लिए विदा किया करती थी और हँसते हँसते अपने आभूषण उतार कर इस देश की सुरक्षा पर वार दिया करती थी | 


उन दिनों टी वी नही हुआ करता था इसलिए हम सब रेडियो पर कान लगाये अपने देश के सिपाहियों के वीरता के किस्से सुना करते थे और पकिस्तान के झूठे किस्सों की पोल खोलता ,”ढोल की पोल ”कार्यक्रम हम सबका पसंदीदा कायर्क्रम हुआ करता था |उस समय देश भक्ति से ओत प्रोत देशवासियों को लाल बहादुर शास्त्री जी ने एक नारा दिया ,”जय जवान जय किसान ” तब देश में गेहूँ की आपूर्ति से निबटने के लिए उनके एक आव्हान पर समूचे देशवासियों ने सोमवार को एक वक्त का भोजन खाना बंद कर दिया था ,हम भी उन दिनों सोमवार की रात को भोजन नही किया करते थे ,कई लोगों ने अपने घरों में ,छोटी छोटी जगह पर भी गेहूँ की फसल लगानी शुरू कर दी थी | देखने में भले ही उनका कद छोटा था लेकिन उनके व्यक्तित्व के प्रभाव में पूरा देश था ,कहते है यथा राजा तथा प्रजा ,उस कहावत की वह एक जीती जागती मिसाल थे ,उनकी ही तरह जनता नैतिकता और ईमानदारी की कद्र किया करती थी । 


जंग समाप्त होने के पश्चात जब मैने समाचारपत्र में पढ़ा था कि वह संधि पर हस्ताक्षर करने ताशकंद जाने वाले है तब उनके ताशकंद जाने से दो दिन पूर्व मेरी छोटी बहन को ,जो अब एक डाक्टर है ,भयानक सपना आया , जिसे उसने सुबह होते ही मुझे सुनाया , ,”उसने सपने में देखा था कि शास्त्री जी का ताशकंद में निधन हो गया ”,सपने तो सपने होते है और और ऐसा कहते भी है अगर ऐसा स्वप्न देखो तो उस शख्स कि आयु बढ़ जाती है, यह सोच हमने उस सपने पर ज्यादा गौर नही किया लेकिन 11 जनवरी 1966 सुबह सात बजे के समाचार सुनते ही हम दोनों बहने बिस्तर से उछल कर बैठ गई और एक दूसरे का मुख देखने लगी ,जितनी रहस्यमय शास्त्री जी की मौत थी उतना ही रहस्यमय मेरी बहन का वह स्वप्न था जो आज भी रहस्य बना हुआ है ,उसे उनकी मृत्यु का पूर्वाभास कैसे हो गया था ?


शास्त्री जी के महान व्यक्तित्व ने हमारे दिलों पर उस समय जो गहरी छाप छोड़ी थी उसके निशान आज भी बरकरार है |

जय भारत जय हिन्द

रेखा जोशी 

जो दिया तुम को प्रभु ने कर लो स्वीकार उसे

संभल  जाओ  मत  रखो  द्वेष  अपने  मन में
ज्वाला  ईर्ष्या  की जलाना  मत अपने  मन में
जो दिया तुम को  प्रभु  ने कर लो स्वीकार उसे
मिलेगा  सब धीरज  रखना तुम अपने मन में

रेखा जोशी

Friday, 9 January 2015

रिसने लगे आज तो वह ज़ख्म पुराने

सहते रहे तुम्हारे शब्दों के तीर हम
बहाते  रहे  सजन  नैनों से नीर हम
रिसने लगे आज तो वह ज़ख्म पुराने
तुम्ही बताओ अब कैसे धरें धीर हम

रेखा जोशी 

फिसल गया हाथों से रेत की तरह

मिले थे हम तुम दिल हुआ दीवाना
तकदीर  के  हाथों   बना  अफ़साना
 फिसल गया हाथों से रेत की तरह
जिया कभी यहाँ वह गुज़रा ज़माना

रेखा जोशी 

Thursday, 8 January 2015

चलें दूर गगन के द्वारे

चल री सखी
पर्वतों के उस पार
बादलों के रथ पर
हो के सवार
,
चलें दूर  गगन के द्वारे
अनछुआ अनुपम सौंदर्य
बिखरा है जहाँ
विविधता लिये
मन को भाते रंगीन नज़ारे
बज रहे जहाँ सुर ताल के
बादलों की छटा से
छिटकती रोशनी  गुनगुना रही
मधुर तराने
.
चल री सखी
चले वहाँ
रचयिता ने रची
रचना आलौकिक
प्राकृतिक सौंदर्य का
आज रसपान लें
आँखों में बसा ले
कल्पना से लगते
वही खूबसूरत नजारें
.
चल री सखी
पर्वतों के उस पार
बादलों के रथ पर
हो के सवार

रेखा जोशी

इश्क समझे तुम नही अब क्या करें

गीतिका 

तुम मिले खुशियाँ मिली सजदा करें 
इश्क समझे तुम नही अब क्या करें 

मिल गये है जब हमें अपने सनम 
वह समझ पाये नही  अब क्या करें 

दी हमे थी चोट जब तुमने  बहुत 
कर रहे सज़दा वही  अब क्या करें 

ज़ख्म जो नासूर बन तड़पा रहा 
भर  नहीं पाया वही अब क्या करें 

थे बनाने हम चले किस्मत सनम 
राह में छोडा कहीं  अब क्या करें 

 था  सहारा प्यार का जोशी सदा 
जब न चाहें वो कभी  अब क्या करें 

रेखा जोशी 

तुम मिले तो ख़ुशी मिली लेकिन

जब  खिज़ा में कली नही खिलती 
प्यार बिन अब ख़ुशी नही मिलती 
तुम  मिले  तो ख़ुशी मिली लेकिन 
ज़िन्दगी   प्यार  से  नही  चलती 

रेखा जोशी 









Wednesday, 7 January 2015

मुस्कुराती कभी या बहाती आँसू यह ज़िन्दगी

अक्सर मै
देखा करती
हूँ ख़्वाब
खुली आँखों से
अच्छा लगता लगा कर
सुनहरे पँख
जब
आकाश में उड़ता मेरा मन
छिड़ जाते जब तार
इंद्रधनुष के
और बज उठता
अनुपम संगीत
थिरकने लगता मेरा मन
होता सृजन मेरी
कल्पनाओं का
जहाँ
मुस्कुराती कभी
या
बहाती  आँसू
यह ज़िन्दगी


रेखा जोशी


Tuesday, 6 January 2015

बहा के खून अपना सींचा यह चमन हमने


चाहा  तुम्हे जान से ज्यादा ऐ वतन हमने
किये  पाक के  नापाक  इरादे  दमन हमने
आँखे नम अपनी  देख बलिदान शहीदों का
बहा के खून अपना सींचा यह चमन हमने

रेखा जोशी


छू रही सागर की लहरों को अरुण की रश्मियाँ

सूरज की स्वर्णिम किरणों का आगाज़ हो रहा है
रंग   सिंदूरी  अब   नीला  आसमान  हो  रहा  है
छू  रही  सागर की लहरों को अरुण की रश्मियाँ
सुनहरा आँचल  सागर का दीप्तिमान  हो रहा है

रेखा जोशी


आनंद ही आनंद

जीवन में
आनंद  है  कहाँ
ढूँढता उसे फिर रहा

न हो  पाया भेद कभी
पाप और पुण्य में
अभिशप्त जीवन है कहीं
वरदान कोई पा रहा

कोई रोता जग में
खुशियाँ कोई मना रहा
पूर्णता की चाह में
हर कोई यहाँ
अपूर्ण ही रहा

झाँका जो भीतर
मन में अपने
शांत न उसे कर पाया
भटकता रहा यहाँ वहाँ
 उम्र भर  रहा तड़पता
पाया न कभी चैन
किसी ने यहाँ

मिलेगा
आनंद तुम्हे
अंतस में अपने
पाओगे तुम
हृदय में अपने
शांतचित से
करके बंद पलके
आनंद ही आनंद

रेखा जोशी

Monday, 5 January 2015

दिखायें हाल ऐ दिल अपना अब कैसे

दिल  दीवाना आज  इकरार करता है
प्यार अपने  का यह इज़हार करता है
दिखायें हाल ऐ दिल अपना अब कैसे
रात  दिन  तुम्हारा  इंतज़ार करता है

रेखा जोशी

त्रिवेणी पर एक प्रयास

धुआँ धुआँ सा जल रहा यहाँ  दिल मेरा
सुलग  रहा  भीतर  कुछ  धीरे  धीरे  से

माचिस तो जल रही थी हाथ में तेरे

रेखा जोशी 

Saturday, 3 January 2015

आधुनिकता की आड़ में पाश्चात्य सभ्यता का अंधाधुन्द अनुसरण


सुमन आज बहुत दुखी थी ,उसकी जान से भी प्यारी सखी दीपा के घर पर आज मातम छाया हुआ था |कोई ऐसे कैसे कर सकता है ,इक नन्ही सी जान,एक अबोध बच्ची , जिसने अभी जिंदगी में कुछ देखा ही नही ,जिसे कुछ पता ही नही ,एक दरिंदा अपने वहशीपन से उसकी पूरी जिंदगी कैसे  बर्बाद कर सकता है |दीपा की चार वर्षीय कोमल सी कली के साथ दुष्कर्म,यह सोच कर भी काँप उठी थी सुमन ,कैसा जंगली जानवर था वह दरिंदा ,जिसे उस छोटी सी बच्ची में अपनी बेटी दिखाई नही दी |सुमन का बस चलता तो उस  जंगली भेड़िये को जान से मार देती ,गोली चला देती वह उस पर |आज वह नन्ही सी कली मुरझाई हुई अस्पताल में बेहोश अधमरी सी पड़ी है |

बलात्कार जैसी बेहद घिनौनी और अमानवीय घटनाएं  तो न मालूम कब से हमारे समाज में चली आ रही है लेकिन बदनामी के डर इस तरह की घटनाओं पर परिवार वाले ही पर्दा  डालते रहते है |आज लोग नैतिकता को तो भुला ही चुकें है ,कई बार अख़बारों  की सुर्ख़ियों में अक्सर बाप द्वारा अपनी ही बच्ची के साथ बलात्कार ,भाईओं दवारा अपनी ही बहनों का यौन शोषण ,पति अपनी अर्धांगिनी की दलाली खाने के समाचार छपते रहते है  और उनके कुकर्म का पर्दाफाश न हो सके ,इसके लिए बेचारी नारी को यातनाये दे कर,ब्लैकमेल कर के उसे अक्सर दवाब में जीने पर मजबूर कर देते है| हमारी संस्कृति ,जीवन शैली ,विचारधारा ,जिंदगी जीने के आयाम सब में बड़ी तेज़ी से परिवर्तन हो रहा है ,आज इस बदलते परिवेश में जहां भारत पूरी दुनिया के साथ हर क्षेत्र में प्रगति  कर रहा है ,वहां सिमटती हुई दुनिया में आधुनिकता की आड़ लिए कई भारतीय महिलाओं ने भी पाश्चात्य सभ्यता का अंधाधुन्द अनुसरण कर छोटे छोटे कपडे पहनने , स्वछंदता , रात के समय घर से बाहर निकलना, अन्य पुरुषों के संपर्क में आना ,तरह तरह के व्यसन पालना ,सब अपनी जीवन शैली  में शामिल कर लिया है और जो उनके अनुसार कथित आधुनिकता के नाम पर गलत नही है परन्तु यह कैसी आधुनिकता जिसने  तो हमारे संस्कारों  की धज्जिया ही उड़ा दी है ,एक तो वैसे ही समय के अभाव के कारण और हर रोज़ की आपाधापी में जी रहे  माँ बाप अपने बच्चों को अच्छे  संस्कार नही दे पा रहे उपर से टी वी ,मैगजींस ,अखबार के  विज्ञापनों में भी नारी के जिस्म की अच्छी खासी नुमाईश की जा रही  है ,जो विकृत मानसिकता वाले लोगों के दिलोदिमाग में विकार पैदा करने में कोई कसर नही छोडती ,''एक तो करेला दूसरा नीम चढ़ा'' वाली बात हो गई |  

ऐसी विक्षिप्त घटिया मानसिकता वाले  पुरुष अपनी दरिंदगी का निशाना उन सीधीसादी कन्याओं पर यां भोली भाली निर्दोष बच्चियों को इसलिए बनाते है ताकि वह अबोध बालिकाएं उनके दुवारा किये गए कुकर्म का भांडा न फोड़ सकें और वह जंगली भेड़िये आराम से खुले आम समाज घूमते रहें और मौका पाते ही किसी  भी अबोध बालिका अथवा कन्या को दबोच  लें | सुमन की सहेली दीपा ने पुलिस स्टेशन में जा कर '' एफ आई आर'' भी दर्ज़ करवा दी  ,पर क्या पुलिस उस अपराधी को पकड़ पाए गी ?क्या कानून उसे सजा दे पाए गा ?कब तक न्याय मिल पाये गा उस कुम्हलाई हुई कली को ?ऐसे अनेक प्रश्न सुमन के मन में रह रह कर उठ रहे थे |इन सब से उपर सुमन उस नन्ही सी बच्ची को लेकर परेशान थी ,अगर जिंदगी और मौत में झूल रही वह अबोध बच्ची बच भी गई तो क्या वह अपनी बाक़ी जिंदगी सामान्य  ढंग से जी पाएगी ?

रेखा जोशी 

Friday, 2 January 2015

तकते रहे हम तो अधखुली निगाहों से

मिली थी  तुमसे ज़िंदगी प्यार में हमे
छोड़ा  क्यों फिर डूबने मँझधार में हमे
तकते  रहे हम तो अधखुली निगाहों से
चले सवार  कश्ती में छोड़ धार में हमे

रेखा जोशी 

बदली में मयंक [हाइकु ]


निकला चाँद 
लहराती चांदनी
तुम्हारा साथ 
……………
आंखें चुराता 
बदली में मयंक 
शरमाया सा
...............
रात सुहानी
बिखरती चाँदनी
धरा  चांदी सी 
................ 
चांद सितारे
चमकता गगन
हमें पुकारें
...............
हाथों में हाथ
ज़िन्दगी का सफर
निभाना साथ

रेखा जोशी

तुम्हारे इंतज़ार में

तस्वीर से 
निकल कर 
तुम आ भी जाओ 
अब मेरे सनम 

कब से निहार रहे    
हम तुम्हे 
बुन रहे सपने सुहाने 

ओ साथी मेरे 
थम गया वक्त 
रुक गई सांसे अब 

नही हो रही खत्म 
घड़ियाँ अब 
तुम्हारे इंतज़ार में 


रेखा जोशी 

छोड़ा हमे सिसकते हुये लगाया दर्द सीने से


दिल की लगी को
दिल लगा कर
तुमसे
अब समझे हम 

छुपाये अपने  नयनों में 
अश्क ,
याद तेरी संग 

खोये हम
जाने कब से रहे  भटक
तन्हा तन्हा हम =

इक कसक इक  टीस 
दिल में छुपा कर 
खो गये  हो तुम

छोड़ा हमे 
सिसकते हुये 
लगाया 
दर्द सीने से 

याद को तेरी
बना लिया साथी 
उम्र भर के लिए  

दिल की लगी को
दिल लगा कर
तुमसे
अब समझे हम , 

रेखा जोशी

Thursday, 1 January 2015

सभी मित्रों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें

मंगलमय
नूतन वर्ष आया 
खुशियाँ लाया 


सभी मित्रों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें 

रेखा जोशी 

मोहना मन में समाया

मोहना मन में समाया 
माँ यशोदा ने मनाया 
देवकी  को प्यार तुमसे
गोपियों को भी रिझाया 
रेखा जोशी