Thursday, 22 February 2018

हाथ जोड़ हम सबको करते सादर प्रणाम

सिखाता सभी का करना ये आदर प्रणाम
हाथ जोड़ हम सबको करते सादर प्रणाम
,
प्रेम सत्य  प्रेम  ही शिव  सबसे सुंदर  प्रेम
प्रेम से  सबको शीश नवा के सादर प्रणाम
,
शीतल करे मन सदा प्रणाम क्रोध मिटा कर
क्रोध तज के झुकना सिखा दे सादर प्रणाम
,
प्रणाम  करने  से  मिलते अनमोल परिणाम
अहंकार  को  मिटा  हम  करें सादर प्रणाम
,
प्रणाम  हमारी  संस्कृति  प्रणाम  है सभ्यता
एक बार सबको करें फिर से  सादर प्रणाम

रेखा जोशी

Wednesday, 21 February 2018

हर्ष में खिलता हुआ प्यार यह ज़िंदगी


माना दर्द भरा संसार यह ज़िंदगी
लेकिन फिर भी है दमदार यह ज़िंदगी
,
आंसू  बहते  कहीं  मनाते जश्न  यहां
सुख दुख देती हमें अपार यह ज़िंदगी
,
रूप जीवन का बदल रहा पल पल यहां
लेकर नव रूप करे सिंगार यह जिंदगी
,
ढलती शाम डूबे सूरज नित धरा पर
आगमन भोर का आधार यह ज़िंदगी
,
चाहे मिले ग़म खुशियां मिली है हज़ार
हर्ष में खिलता हुआ प्यार यह ज़िंदगी

रेखा जोशी

Monday, 19 February 2018

उपवन सजा हुआ है अब फूल मुस्कुराएं

छंद – दिग्पाल (मापनी युक्त)
मापनी -221 2122 221 2122

उपवन सजा हुआ है अब फूल मुस्कुराएं
हमको मिले पिया तुम हम आज गीत गाएं
,
खामोश चल रही है यह ज़िन्दगी हमारी
देखो  बुला  रही  हैं शीतल  हमें  हवाएं
,
साजन चलें सफर में अब साथ साथ दोनों
तेरे सिवा  हमें सजना कुछ न और भाए
,
छाई  बहार मौसम साजन खिला खिला सा
है चांदनी गगन में बिखरी यहां अदाएं
,
राहें जुदा जुदा थी पर आज मिल गये तुम
साथी जन्म जन्म के खुशियाँ यहां मनाएं

रेखा जोशी

शोषित हो रही नारी जाग मानो न अपनी हार

शोषित हो रही नारी जाग मानो न अपनी हार
आवाज़ उठा खिलाफ जुल्म के है तेरा अधिकार
,
मनुष्य रुप में छिपे भेड़िये कर पहचान उनकी
बनने पाये न  फिर से यहाँ कोई बाला शिकार
,
होती थी  पूजा  नारी की कभी  अपने  देश में
न जाने क्यों बढ़ रहा है अब भारत में व्यभिचार
,
शिक्षित बच्चें हो ऐसे देश में मिले संस्कार अच्छे
आने  न  पाये  भूल से  मन  में कोई  दुर्विचार
,
है  बहुत  सहे  जुल्म  नारी  ने अपने  ही देश में
नारी की व्‍यथा को हमें अब  करना है स्वीकार

रेखा जोशी

,

Saturday, 17 February 2018

मुक्तक


मुक्तक 1

पुष्पित उपवन ने ,महकाया है आंगन,  अम्बुआ की डार पर,कुहके कोयलिया 
है छाई बहार यहाँ,दामन भर ले ख़ुशी,मौसम का है इशारा,साजन तड़पे जिया  
मचलती कामनाएँ , ज़मीन से आसमान ,पुकारे अब बहारे,  दिल के तार छिड़े 
खिला खिला रूप तेरा,ह्रदय मेरा लुभाये,आजा सजन अँगना,जिया धड़के पिया 
,
मुक्तक 2

शीतल चली हवाएँ मौसम प्यार का
गीत  गाते  भँवरे  मौसम  बहार  का
आजा  साँवरिया  दिल तुमको पुकारे
अरमां  मचलते  मौसम  इंतज़ार का

रेखा जोशी 

Friday, 16 February 2018


जीवन में  हम  तुम  रहेंगे  संग संग
हाथ  में   ले  हाथ  चलेंगे  संग संग
हो जन्म जन्म  के  साथी  तुम हमारे
जियें और  मरें गे हम तुम संग संग

रेखा जोशी 

खुशी से खिल जायेंगे कमल

फिर  एक  दिन ऐसा आयेगा
खुशियाँ  घर   में बिखरायेगा
,
खुशी से खिल जायेंगे कमल
मेरा     सजन    मुस्कुरायेगा
,
सज जायेगा फिर सारा जहां
फूल उपवन खिलखिलायेगा
,
अब रोको न तुम उमंगों को
अंबर    भी   नैन   चुरायेगा
,
कागज़ कश्ती का खेल फिर से
बचपन की  याद दिलायेगा

रेखा जोशी