Monday, 21 August 2017

जूही बेला मोंगरा की कली

जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
संवारती घर पिया का
गाती गुनगुनाती
.
पीर न उसकी
जाने कोई
दर्द सबका अपनाती
खुद भूखी रह कर भी
माँ का फ़र्ज़ निभाती
जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
.
कोई उसको समझे न पर
रोती लुटती बीच बाजार
रौंदी मसली जाती
गंदी नाली में दी जाती फेंक
चाहेकितना करे चीत्कार
तड़पाता उसे ज़ालिम सँसार
खरीदी बेचीं जाती
जूही बेला मोंगरा की कली
झूठी मुस्कान होंठो पर लिये
आखिर मुरझा जाती

जूही बेला मोंगरा की कली
खिलती बाबुल के अँगना
महकती महकाती
रेखा जोशी

Sunday, 20 August 2017

रिश्ते

देखे दुनिया कीभीड़ में
हमने
बिखरते रिश्ते
जीवन की भाग दौड़ में
सिसकते रिश्ते
छूटते रिश्ते

भाषा प्रेम की
कोई नहीं जानता
देखे
पत्थरों के शहर में
टूटते रिश्ते

रिश्ते रिश्ते
है देखे हमने
बनते बिगड़ते रिश्ते
छल फरेब
ईर्ष्या द्वेष से नहीं
प्यार और मुहब्बत से
हैं जुड़ते
और
संवरते रिश्ते

रेखा जोशी 

Saturday, 19 August 2017

वफ़ा की आस थी वह बेवफ़ा है

नहीं कुछ प्यार में अब तो रखा है
वफ़ा की आस थी वह बेवफ़ा है
,
दिखायें हम किसे यह ज़खम दिल के
रही अब ज़िन्दगी बन के सजा है
,
गिला शिकवा कभी कोई नहीं अब
सिला क्या प्यार का हमको मिला है
,
मिला है दर्द ही तो ज़िन्दगी में
जिगर में दर्द को हमने रखा है
,
हमें छोड़ा अकेला ज़िन्दगी ने
न जाने क्या हुई हमसे खता है
,
खिली है धूप आंगन में सभी के
लगाया रात ने डेरा यहां है
,
खता हमसे हुई वो माफ कर दे
पिया कदमों तले यह सर झुका है
,
कभी तुम फिर हमें मत याद करना
मिटाया नाम दिल पर जो लिखा है
,
निगाहों से पिलाया जाम तुमने
असर यह प्यार का कैसा हुआ है
,
मुझे तू  प्यार से इक बार तो मिल
जिगर दिल खोल कर अपना रखा है
,
नहीं चाहत हमें अब प्यार की पर
बता दें तू पिया क्या चाहता है

रेखा जोशी

Friday, 18 August 2017

थोथा चना बाजे घना


शांत  गहरे सागर रहते
झर झर झर झरने छलकते
,
ज्ञानी मौन यहां पर रहें
पोंगे पण्डित ज्ञान  देवें
,
थोथा चना बाजे घना
गुणगान करे अपना यहां
,
कुहू कुहूक कोयल गाए
राग गाता  कागा जाए
,
आधा अधूरा ज्ञान लिए
गुणों का अपने गान करे

रेखा जोशी

Wednesday, 16 August 2017

बहारें ज़िन्दगी में प्यार ले कर आप आयें है

विधाता छंद
1222. 1222. 1222. 1222

बहारें ज़िन्दगी में प्यार ले कर आप आयें हैं
कलम से खींच सपने आज काग़ज़ पर सजायें हैं
,
निगाहों में हमें तेरी दिखा है प्यार ही साजन
मिले जो तुम हमें तो फूल अंगना में खिलायें हैं
,
कहेंगे बात दिल की अब निगाहों ही निगाहों से
सजन अब बात दिल की हम यहां तुमको सुनायें हैं
,
खुशी अपनी पिया कैसे बतायें आज हम तुमको
पिया हम संग दिल में प्यार भर कर आज लायें हैं
,
हवाएं भी यहां पर आज हमको छेड़ती साजन
कहे जोशी नज़ारों  से पिया दिल में समायें है

रेखा जोशी

काली अँधेरी रात
छूटा साये  का भी साथ
धड़कता दिल कांपते हाथ

लगता क्यों
न जाने
कोई है मेरे साथ
चल रहा संग मेरे
जगाता दिल में मेरे
इक आस
रख कर हिम्मत
बढ़ता चल न डर
झाँक दिल में अपने
थरथराती लौ दिये की
दिखा रही राह
स्याह अँधेरे में
लेकिन
फिर भी रहा मेरा
धड़कता दिल कांपते हाथ

भीतर ही भीतर
हो रही उजागर
राह मंज़िल की
थामे अपनी साँसे
नहीं दी बुझने
वह थरथराती लौ
रखती रही पग अपने
संभल संभल कर
लेकिन
फिर भी रहा मेरा
धड़कता दिल कांपते हाथ

रेखा जोशी

Monday, 14 August 2017

कुकुभ छंद

 छंद कुकुभ
यह चार पद का अर्द्धमात्रिक छन्द है. दो चरणों के हर पद में 30 मात्राएँ होती हैं और यति १६,१४ पर होती है, पदां त में दो गुरु आते है।

हे माखनचोर नन्दलाला ,है मुरली मधुर बजाये 
धुन सुन  मुरली की गोपाला ,राधिका मन  मुस्कुराये
चंचल नैना चंचल चितवन, राधा को मोहन  भाये  
कन्हैया से  छीनी मुरलिया  ,बाँसुरिया  अधर लगाये

छंद पर आधारित मुक्तक 

हे माखनचोर नन्दलाला ,है मुरली मधुर बजाये 
धुन सुन  मुरली की गोपाला ,राधिका मन मुस्कुराये 
चंचल नैना चंचल चितवन,  गोपाला से प्रीत लगी
कन्हैया से छीनी मुरलिया  , बाँसुरिया अधर लगाये 

रेखा जोशी